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कमाडर-इन-चीफ बने रहें और उनकी स्थिति सुरक्षित रहे। प्रसंविदाओं से उत्पन्न इन बातों का, जो, जैसा कि मैंने कहा था, पहले ही की जा चुकी थीं, और जिनके आधार पर अंगीकरण किया गया था, आदर किया जाना चाहिए। मैं आशा करता हूँ और मेरा विश्वास है कि एक समय ऐसा आएगा जब राज्य स्वेच्छा से इस बात के लिए सहमत होंगे कि संसद, नियमित भारतीय सेना और उनके द्वारा तैयार किए गए बलों के बीच पूर्ण एकरूपता के लिए, पूर्ण अधिकारिता का प्रयोग करे। इसीलिए हमें आज को करना है, वह एक प्रकार का समझौता है। ये धाराएँ 4 और 5 वास्तव में ऐसा सर्वोत्तम समझौता निरूपित करती हैं जो हम कर सकते हैं।
पंडित कुंज़रुः यदि मैं अपने माननीय मित्र को बीच में टोक सकता हूँ तो उन्होंने बहुत ही व्यापक प्रश्न का समाधान किया है। मेरी आलोचना तो मात्र एक बिन्दु तक सीमित थी। संविधान के अनुच्छेद 259 द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग सेना अधिनियम का विस्तार भाग ‘ख’ राज्यों के बलों पर करने के लिए क्यों नहीं किया है?
डॉ. अम्बेडकरः मैं इसी का समाधान करना चाहता हूँ।
पंडित कुंज़रुः मैंने समस्या के उस व्यापक पहलू पर विचार नहीं किया है जिसके संबंध में मेरे माननीय मित्र ने अब तक विचार किया है।
डॉ. अम्बेडकरः किन्तु, व्यापक पहलू ही वास्तविक पहलू हैं। पूरा प्रश्न संविधान बनाए जाने के पूर्व की गई प्रसंविदाओं द्वारा नियंत्रित है, जब तक कि मेरे माननीय मित्र का वस्तुतः पक्ष यह न हो कि प्रसंविदा हो या न हो, करार हो या न हो, समझ हो या न हो, जहाँ संसद को शक्ति प्राप्त हो, वहाँ संसद को इसका प्रयोग करना चाहिए। वह एक भिन्न स्थिति हो जाएगी।
3.00 बजे अपराह्न
पंडित कुंज़रुः निश्चित रूप से मेरे माननीय मित्र को यह ज्ञात है कि 24 जनवरी को राज्यों के संघों और मैसूर राज्य ने संविधान को स्वीकार करते हुए और यह कहते हुए एक उद्घोषणा जारी की थी कि ऐसे करार जो संशोधन के उपबंधों से असंगत हों, अविधिमान्य हैं।
डॉ. अम्बेडकरः जी हाँ, ऐसा हो सकता है। जैसा कि मैंने कहा, हम वास्तव में एक समझ पर चल रहे हैं। इस पर आने के पूर्व, मैं उनका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहूँगा कि उन्होंने खंड 2 के एक महत्वपूर्ण बिन्दु, अर्थात् खंड (2) के भाग (ख) का उल्लेख नहीं किया है जो निम्नानुसार हैः
फ्किसी भाग ‘ख’ राज्य की थल-सेना के व्यक्ति, जब वे सेवा के लिए नियमित सेना के किसी निकाय से सम्बद्ध किए जाएं या जब उक्त बल पूर्णतया या अंशतः