14. सेना विधेयक - Page 103

88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इससे संबंधित कुछ अन्य उपबंध भी विधेयक में हैं। उन पर भी विचार करना चाहिए। वे खंड 125, 126 और 127 हैं। सेना न्यायालयों के विचारण के लिए छोड़े गए अपराधों पर उनका विवेकाधिकार या अधिकारिता आत्यंतिक नहीं है बल्कि यह मेरे द्वारा निर्दिष्ट उपबंधों द्वारा शासित हैं, अर्थात् सेना न्यायालय, खंड 125 के अधीन यह विनिश्चित कर सकेगा कि वह अपराध का विचारण करना चाहता है या नहीं। यदि सिविल न्यायालयों का विचार है कि अपराधों का विचारण उनके द्वारा किया जाना चाहिए तो उन्हें खंड 126 के अधान भारत सकार की अनुमति प्राप्त करनी चाहिए और यदि अनुमति प्रदान कर दी जाती है तो वे अपराधों के विचारण की कार्यवाही कर सकते हैं। एक और उपबंध भी है, जो एक तरह से एक असाधारण बात है अर्थात् फ्उत्तरोत्तर विचारणय्। यदि यह पाया जाए कि अपराध गंभीर या घोर है किन्तु अपराध का विचारण करने के लिए अनुज्ञप्राप्त सेना न्यायालय ने उस व्यक्ति को हल्का-फुलका दंड देकर छोड़ दिया है तो भारत सरकार द्वारा प्रदत्त अनुमति के अधीन उस व्यक्ति का विचारण दो बार किया जा सकता है। उल्लिखित कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए, अर्थात् सभी अपराधों का विचारण करने के लिए सिविल न्यायालयों को अनुज्ञात करना, और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि खंड 125 और 127 में उपबंध अंतर्विष्ट हैं, मैं यह अनुध्यात नहीं करता कि ऐसे मामलों की संख्या अधिक होने की संभावना है जिनमें घोर अन्याय होना वर्णित किया जा सके। मेरा विचार है कि इस प्रकार की घटना के निवारण के लिए हमने पर्याप्त पूर्वावधानी बरती है और इसीलिए मेरा निवेदन है कि इन उपबंधों को तथा धारा 70 को ध्यान में रखते हुए विधेयक के इस भाग के संबंध में कोई आपत्ति नहीं हो सकती।

मैं यह भी उल्लेख करना चाहूँगाµमैं समझता हूँ कि इसका निर्देश किसी व्यक्ति द्वारा किया गया थाµकि इस विधेयक का खंड 70 वास्तव मे ब्रिटिश आर्मी ऐक्ट की धारा 41 की पुनरावृत्ति है। वहाँ भी उन्होंने वैसा ही उपबंध किया है। यू.एस.ए. (संयुक्त राज्य अमेरिका) में उपबंध अधिक विस्तृत है। आखि़र इस मामले पर हमें अपराधी के दृष्टिकोण से ध्यान देना होगा, शिकायतकर्ता के दृष्टिकोण से उतना नहीं। इन सभी मामलों में अपराधी सैनिक होगा और प्रश्न यह है कि क्या उस सैनिक को, जो किसी विशिष्ट अपराध का अभियुक्त है और यदि वह सैनिक नहीं होता तो उसका विचारण सिविल न्यायालयों द्वारा किया जाता उसे सेना न्यायालयों में न्याय प्राप्त नहीं होता।

मेरे मित्र ने कहा कि वे लोग जो सेना न्यायालय में बैठते हैं, प्रशिक्षित वकील नहीं होते। मैं नहीं जानता किन्तु अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूँ कि मैं कुछ जज एडवोकेट-जनरल से मिला हूँ, वे यदि बेहतर नहीं तो इतने ही कुशल थे जितने वे वकील होते हैं जो हमें न्यायालयों मे मिलते हैं। तथापि, निश्चित रूप से सैनिक को यह अपेक्षा नहीं होती है कि उसे असैनिक अपराध करने के लिए बेहतर न्याय प्राप्त