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हो सकता, उसकी तुलना में जो कोई सैनिक अपराध करने के लिए सामान्य रूप से अपेक्षित हो। यदि उसे वैसा ही न्याय मिले जैसा कि सिविल न्यायालयों से मिलता है तो मैं नहीं समझता कि शिकायत का कोई कारण होना चाहिए। मेरे मित्र को इस संबंध में किसी प्रकार का भ्रम रखने की आवश्यकता नहीं है। मैं नहीं समझता कि उनकी आलोचना सुव्यवस्थित है।
श्री एस.एन. सिन्हाः वे कौन-से मामले हैं जिनमें दंड न्यायालयों और सेना न्यायालय को समवर्ती अधिकारिता प्राप्त हैं? खंड 125 के अधीन विकल्प का प्रयोग किया जाता है।
डॉ. अम्बेडकरः मैं नहीं कह सकता। इसमें एक प्रकार का वृहत संकलन अपेक्षित है। निस्संदेह ऐसे कुछ अपराध है जो सिविल और सेना दोनों न्यायालयों की अधिकारिता के भीतर आते हैं।
श्री एस.एन. सिन्हाः मेरी दलील यह थी कि विधेयक का केवल खंड 70 ही विशिष्ट मामलों के संबंध में सामान्य दण्ड न्यायालयों को अधिकारिता देता है।
पंडित कुंज़रुः बहुत से माननीय सदस्यों के मन में यह संदेह है। यदि मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर खंड 125 को देखें तो वे पाएँगे कि प्रारम्भिक शब्द है, फ्जब अधिकारिता रखने वाले किसी दंड न्यायालय की राय हो..................।य् प्रश्न यह है कि फ्अधिकारिता रखने वालेय् शब्दों का क्या अर्थ है। क्या उनका अर्थ देश की सामान्य दण्ड विधि के अधीन अधिकारिता रखने वाले हैं अथवा इस विधेयक के अधीन अधिकारिता रखने वाले? यह ऐसा प्रश्न है जिससे अनेक माननीय सदस्य परेशान हैं। यदि यह कहा जाए कि इन शब्दों का अर्थ इस विधेयक के अधीन अधिकारिता रखने वाले..........
डॉ. अम्बेडकरः साधारण विधि के अधीन।
पंडित कुंज़रुः तब स्पष्ट रूप से खंड 69, उन मामलों को छोड़कर जो धारा 70 के अंतर्गत आते हैं, किसी भी दांडिक मामले का विचारण करने के लिए साधारण दण्ड न्यायालयों को विवर्जित करता है। वास्तविक प्रश्न यही है।
डॉ. अम्बेडकरः सिविल अपराध को विधेयक के पृष्ठ सं. 2 पर परिभाषित किया गया है जिसका अर्थ फ्कोई अपराध जिसका विचारण दण्ड न्यायालय द्वारा किया जा सके, जोकि सेना न्यायालय से भिन्न है।’’