16. लोक प्रतिनिधित्व विधेयक - Page 153

138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री गौतम (उत्तर प्रदेश)ः मैं सदन का अधिक समय नहीं लेना चाहता। मैं श्री जसपत रॉय कपूर द्वारा प्रस्तुत संशोधन का विरोध करता हूँ। मैं यह कहना चाहता हूँ कि जहाँ तक उच्च सदन का संबंधं है, हम यू.पी. के लोग और यू.पी. की सरकार 72 की संख्या से संतुष्ट हैं। हमें और अधिक नहीं चाहिए और..........

श्री जे.आर. कपूरः क्या माननीय सदस्य का यह दावा है कि वे सरकार और जनता दोनों के लिए यू.पी. के एकमात्र प्रतिनिधि हैं?

श्री गौतमः मुझे सरकार का मन ज्ञात है और मैं यह कहने की स्थिति में हूँ कि मुझे जनता की राय पता है। मैं यह दावा कर सकता हूँ कि मैं महासचिव के रूप में कांग्रेस संगठन का प्रतिनिधित्व करता हूँ और यह कह सकता हूँ कि मैं कुछ लोगों का भी प्रतिनिधित्व करता हूँ कम-से-कम उनका।

श्री श्यामनन्दन सहायः वे जसपत राय कपूर हैं?

श्री गौतमः यदि वे कांग्रेसी हैं।

श्री त्यागीः मैं भूतपूर्व महासचिव हूँ।

श्री गौतमः डॉ. अम्बेडकर को कोई निजी स्वार्थ सिद्ध नहीं करना है। वे यू.पी. में दिलचस्पी नहीं रखते। हम में से कुछ के अनुरोध पर उन्होंने संख्या कम की है। वे 72 या 86 के पक्ष में नहीं हैं। ये हम हैं जिन्होंने उनसे अनुरोध किया था और उन्होंने हमारा अनुरोध स्वीकार किया था। इसके लिए हम उनके आभारी हैं। इसीलिए मैं श्री जसपत राय कपूर द्वारा प्रस्तुत संशोधन का विरोध करता हूँ।

ऽडॉ. अम्बेडकरः श्रीमन्, मैं नहीं समझता कि इस अंतिम चरण में उठाए गए विभिन्न मामलों, सांविधानिक या अन्यथा, के संबंध में, मैं किसी विस्तृत चर्चा में सम्मिलित हो सकता हूँ। मैं नहीं समझता कि भाग ‘ग’ राज्यों की पहली अनुसूची में उल्लिखित आंबटित स्थानों के संबंध में हमने कहीं संविधान का अतिक्रमण किया है जैसा कि मेरे मित्र श्री टी.टी. कृष्णमाचारी मानते हैं। इस अनुसूची में स्थानों के आबंटन के संबंध में हमने पूर्णतया संविधान का पालन किया है। तीसरी अनुसूची के संशोधन के संबंध में मेरे मित्र पंडित कुंज़रु ने देखा होगा कि वास्तव में यह केवल एक मामले में था कि कुल संख्या को कम किया गया है और यह उत्तर प्रदेश के संबंध में है।

डॉ. अम्बेडकरः मैं उस पर आ रहा था। मैं अपनी मताभिव्यक्ति के लिए उत्तर प्रदेश को ले रहा हूँ। वहाँ मेरे सामने यह तथ्य आया है कि राज्य सरकार उच्च सदन के आकार में वृद्धि के लिए बहुत संकोची है औ चूंकि हम दिल्ली में हैं, इसलिए मैं

ऽसं. वा., खंड 4, भाग II, 20 अप्रैल, 1950, पृष्ठ 3095-96