164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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ऽभारतीय टैरिफ (चतुर्थ संशोधन) विधेयक
विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर)ः मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है कि इस प्रकार का प्रश्न मेरे माननीय मित्र श्री त्यागी द्वारा उठाया जाना चाहिए था जिन्होंने हमेशा इस सदन में कहा है कि वे इस देश की सबसे अनपढ़ जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह एक ऐसा प्रश्न है मैं सोचता हूँ जिसने कई वकीलों को उलझन में डाला है तथा मुझे सोचना चाहिए था कि मेरे मित्र के लिए इस विषय को किसी अन्य को सौंप देना ही उपयुक्त था। जब जबकि यह प्रश्न उठाया ही जा चुका है और आपने इस विषय में अपना मत भी प्रकट कर दिया है कि इस प्रकार का सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस पर निर्णय अवश्य होना चाहिए, मैं इस विषय पर कुछ कहना चाहूँगा। जब मैं श्री त्यागी द्वारा की जा रही टिप्पणियों को सुन रहा था तो मैंने सोचा कि वे दो भिन्न मुद्दों को एक समझ कर संभ्रमित हो रहे हैं, जबकि इन दो विषयों को अलग-अलग रखा जाना चाहिए था। एक, क्या संसद अपने प्राधिकार प्रत्योयाजित कर सकती है। दूसरा, क्या संसद को ऐसा करना चाहिए। मेरे विचार से दोनों प्रश्न अलग-अलग हैं। हमें इनमें से किसी एक पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए इन पर बिल्कुल दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए।
मैं पहले प्रश्न पर बात करता हूँ कि क्या संसद अपने प्राधिकार प्रत्यायोजित कर सकती है।
श्री जे.आर. कपूर (उत्तर प्रदेश)ः यही एकमात्र प्रश्न है।
श्री त्यागीः नहीं।
डॉ. अम्बेडकरः नहीं। इस विषय पर जहां तक मैं समझता हूँ, मुझे इसमें कतई संदेह नहीं है कि संसद दूसरी एजेंसियों को अपने प्राधिकार प्रत्यायोजित कर सकती है बशर्तें कि इस प्रकार के प्रत्यायोजन द्वारा संसद ने जो शक्तियां प्रत्यायोजित की हैं उन्हें वापिस लेने का प्राधिकार उससे पूरी तरह न छिने। किसी प्रयोजन के लिए प्रत्यायोजन, किसी समय के लिए प्रत्यायोजन तथा ऐसा प्रत्यायोजन जो संसद को अपने प्राधिकार को वापिस लेने की अनुमति देता हो, प्रत्यायोजन नहीं कहा जा सकता तथा इसीलिए संसद इस विशेष कार्य के लिए अधिनियम बनाने हेतु पूरी तरह सक्षम है। मैं सोचता हूँ कि आस्ट्रेलिया के उच्च न्यायालय द्वारा इस विषय पर दिया गया निर्णय आपको सुनाना यहां श्रेयष्कर होगा। बाद में, मैं इस विधेयक में उठाए गए इस प्रश्न पर प्राधिकार को भी विशेष रूप से उद्धृत करूँगा। यह मामला मीक्स बनाम डिग्नन, 46 कामनवेल्थ लॉ रिपोर्ट, पृष्ठ 117 का है। न्यायमूर्ति इवेट का कहना हैः
ऽसं. वा., खंड 6, भाग II, 4 दिसंबर, 1950, पृष्ठ 1171-76