26. दंत चिकित्सक (संशोधन) विधेयक - Page 231

216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में कोई पद धारित नहीं कर पाएंगे। अतः इस समयावधि को बढ़ाना तथा ऐसे व्यक्तियों को इस बात की अनुमति देना आवश्यक हो गया है कि इस रजिस्टर में उनके नाम दर्ज न होने पर भी वे अस्पतालों में नौकरी पा सकते हैं।

दूसरे, बंगाल में एक दंत चिकित्सा स्कूल है जो दंत चिकित्सा में डिप्लोमा प्रदान करता है। जब इस अधिनियम को पारित किया गया था उस समय यह विवाद था कि क्या बंगाल के इस दंत चिकित्सा स्कूल द्वारा दिए जाने वाले डिप्लोमा को मान्यता दी जाए ताकि डिप्लोमाधारी व्यक्तियों के नाम इस रजिस्टर में दर्ज किए जा सकें। यह महसूस किया गया कि बंगाल के दंत चिकित्सा स्कूल द्वारा दिए जाने वाले डिप्लोमा, रजिस्टर में उनका नाम दर्ज कराए जाने के उद्देश्य सेपर्यप्त रूप से अर्हक नहीं थे। इस दंत चिकित्सा स्कूल द्वारा प्रदान किए गए डिप्लोमाधारी व्यक्तियों द्वारा इस असमर्थता को समाप्त करने के लिए काफी आंदोलन किया गया। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा इस संबंध में एक समझौता सुझाया गया है जिसके अनुसार ऐसे व्यक्तियों के जिन्होंने अपना डिप्लोमा वर्ष 1940 से पहले प्राप्त किया है, नाम कुछ शर्तों पर इस रजिस्टर में दर्ज करने के लिए अर्हक माने जाएंगे। इस समझौते को इस विधेयक में भी स्थान दिया गया है।

अतः इस विधेयक में तीन उपबंध अंतंर्विष्ट हैंः

(1) इस समयावधि को बढ़ाना_ (2) कुछ परिस्थितियों में ऐसे व्यक्तियों के जिनके पास बंगाल के दंत चिकित्सा स्कूल का डिप्लोमा है, नामों को इस रजिस्टर में दर्ज जाने की अनुमति देना_ तथा (3) जब तक यह रजिस्टर तैयार न हो जाए, वर्ष 1951 तक सरकारी अस्पतालों में अपंजीकृत दंत चिकित्सकों का रोजगार जारी रखना।

इस विधेयक में यही सब कुछ शामिल है तथा मुझे आशा है कि सदन को इस विधेयक को अपनी स्वीकृत देने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव पेश किया गयाः

फ्कि दंत चिकित्सक अधिनियम, 1948 का संशोधन करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्

श्री सिधवा (मध्य प्रदेश)ः सबसे पहले मैं इस अध्यादेश को जारी करने पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करता हूँ क्योंकि मार्च माह में सदन की बैठक चल रही थी।

डॉ. अम्बेडकरः यह अध्यादेश मई में किसी समय जारी किया गया था। काश! मेरे माननीय मित्र श्री सिधवा तथा पंडित ठाकुर दास भार्गव द्वारा उठाए गए मुद्दों को उन्होंने उस समय तक के लिए रोके रखा होता जब उनके संशोधनों पर विचार किया जाता। ऐसे मामलों में उत्तर देना निस्सन्देह कुछ परेशानी भरा होगा। तब वे फिर उठाएंगे जब उनके संशोधन पेश किए जाएंगे। लेकिन अब मेरे पास उनके द्वारा उठाए गए बिन्दुओं