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का उत्तर देने के अलावा कोई चारा नहीं है_ किन्तु मैं इनका उत्तर संक्षिप्त रूप से दूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझे कहना पड़ेगा कि............
माननीय अध्यक्षः मैं इन संशोधनों पर किसी प्रकार की बहस की अनुमति देना नहीं चाहता हूँ।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः यदि मेरे माननीय मित्र मेरे द्वारा पेश किए गए संशोधन को स्वीकार नहीं करते हैं तो मैं इसे पेश नहीं करूंगा।
डॉ. अम्बेडकरः श्री सिधवा ने एक या दो मुद्दे उठाए हैं। उनके द्वारा उठाया गया अंतिम मुद्दा यह था कि जब सदन की बैठक चल रही थी तब अध्यादेश क्यों जारी किया गया। इसके दो उत्तर हैं। पहला यह कि इस रजिस्टर को तैयार करने के लिए समयावधि में विस्तार करने संबंधी मामले में भारत सरकार से जो प्रथम अनुरोध किया गया था, वह मद्रास सरकार द्वारा किया गया था और वह भी 15 मार्च, 1950 को या उसे बाद में इसका अर्थ यह है कि इस रजिस्टर को तैयार करने में लगने वाली समयावधि को समाप्त होने में केवल 13 दिन शेष बचे थे। यह पहला कारण है। दूसरा कारण यह है कि मद्रास सरकार से इस पत्र की जिसमें भारत सरकार को सूचित किया गया था कि इस रजिस्टर को पूरा करना उनके लिए संभव नहीं है, प्राप्ति के बाद स्वाभाविक तौर पर भारत सरकार के लिए यह आवश्यक था कि वह अन्य राज्यों से यह पता लगाए कि क्या वे निर्धारित तारीख तक अपनी सूची तैयार करने की स्थिति में हैं, अथवा उन्हें भी इस समयावधि में कुछ विस्तार चाहिए। स्वाभाविक तौर पर इसके बाद भारत सरकार और अन्य विभिन्न राज्यों के बीच पत्राचार चला।
निःसंदेह, उसमें काफी समय लगा, और उसमें समय लगना भी था, जिसका परिणाम यह हुआ कि जब तक भारत सरकार ने उत्तर प्राप्त किए और वह यह मूल्यांकन कर सकी कि क्या मद्रास सरकार द्वारा प्रस्तावित शर्तों के अनुसार संशोधन आवश्यक है, संसद का सत्र समाप्त हो गया। यही कारण है कि मध्यावकाश से पहले वह उपाय पेश नहीं किया जा सका।
मेरे मित्र श्री सिधवा द्वारा उठाया गया दूसरा मुद्दा यह था कि उन्हें इसमें कोई कारण नजर नहीं आता कि बंगाल दंत चिकित्सा स्कूल द्वारा प्रदान की जाने वाली कुछ अर्हताओं को मान्यता देने के लिए सांविधिक उपबंध क्यों किया ना जाए। उनके अनुसार, यह ऐसा मामला था कि जिसे इस अधिनियम के अनुसार दंत चिकित्सा परिषद के विवेक पर छोड़ दिया गया है। मैं सोचता हूँ कि मेरे मित्र श्री सिधवा ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा छोड़ दिया है और वह यह है कि परिषद को मान्यता प्रदान करने का अधिकार उन अर्हताओं या डिग्रियों से संबंधित है जो विद्यमान स्कूलों द्वारा प्रदान की जाती हैं परंतु जिस मामले में हम जुड़े हुए हैं वह एक ऐसा मामला है जिसमें डिग्रियां अथवा डिप्लोमा एक ऐसे