2. संविधि पुनरीक्षण समिति की नियुक्ति - Page 25

10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जहां तक वह ब्रिटिश इंडिया प्रांतों को लागू होती है, पूर्णतया सुदृढ़ है। किंतु यदि उसे देशी रियासतों पर लागू किया जाए तो वह पूरी तरह अस्थिर होगी और कारण यह है कि अनुरूपता पूर्णतया मिथ्या है न कि सत्य। अब, श्रीमान् जी, जब हम ऐसे विधान को जो मूलतः विधेयक में स्वयं को किसी विशिष्ट क्षेत्र तक सीमित करता है, ऐसे अन्य क्षेत्र में लागू करते हैं, जिसे विधेयक पारित करते समय उसका विषय नहीं बनाया गया था तो स्थिति यह होती है कि वह क्षेत्र जिसमें विधान को बाद में विस्तारित किया गया था, उस विधान की अधिकारिता के अधीन नहीं है। यदि विधानमंडल उस विधि को उस क्षेत्र में प्रारम्भ में ही लागू करना चाहता था तो विधानमंडल को इस सरकार के संविधान की या विधानमंडल की शक्तियों में कोई बात ऐसा करने से रोक नहीं सकती थी। जहां तक राज्यों का संबंध है, हमें केवल तीन विषयों के बारे में उनके क्षेत्रों के ऊपर अधिकारिता प्राप्त है, हमें पूर्ण अधिकारिता प्राप्त नहीं है। जब हम इन तीनों विषयों के संबंध में कोई विधान बनाते हैं तो हम अपनी अधिकारिता को सीमित नहीं करते हैं, वास्तव में, हम अपने विधायी प्राधिकार का प्रयोग पूर्ण विस्तार तक, जितना हमारे पास है, करते हैं, अतः यह अनुरूपता सही अनुरूपता नहीं है। जहाँ तक प्रांतों का संबंध है, कोई विधि बनाते समय, जो अधिकारिता हमें उपलब्ध है_ हम उसका प्रयोग करेंगे, यदि हम ऐसा करना चाहें। देशी रियासतों-राज्यों के संबंध में स्थिति ऐसी नहीं है। सच्चाई तो यही है कि यदि कोई अनुपूरक अंगीकार पत्र पारित हो गया होता तो हमें विधि बनाने के प्रयोजन के लिए आवश्यक अधिकारिता प्राप्त हो गई होती_ किन्तु मैं अपने मित्र श्री अनन्तसयनम् अय्यंगर से कहना चाहूंगा कि विधि कभी भी परिकल्पित नहीं हो सकती और विधि को कभी भी अर्जित की जाने वाली अधिकारिता के पूर्वानुमान से पारित नहीं किया जा सकता। यह विधायन के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। विधि निश्चित होनी चाहिए। विधि में यह बात पूर्णतया स्पष्ट होनी चाहिए कि वह कहां लागू हो सकती है और कहां नहीं। और इसीलिए, जब तक हमें राज्यों तक इस विधान को विस्तारित करने की शक्ति केन्द्रीय विधानमंडल को देने वाला अनुपूरक अंगीकार पत्र नहीं मिल जाता, मुझे विश्वास है कि हम यह पूर्वानुमान नहीं लगा सकते कि एक अंगीकार पत्र होगा जिसे गवर्नर जनरल स्वीकार करेगा और तब हमें इस विधान को विस्तारित करने का अवसर मिलेगा। मुझे विश्वास है कि यह विधायन के सिद्धांतों के प्रतिकूल हैं। अतः हमें मात्र यह आशा करनी चाहिए कि इस समय हम विधेयक को ब्रिटिश इंडिया के प्रांतों तक ही समिति रखें और आशा करें कि हमें ऐसे ही अंगीकार-पत्र अनुपूरक अंगीकार पत्र, देशी रियासतों से प्राप्त होंगे और तब हम या तो कानून द्वारा अपने विधान का विस्तार उन राज्यों तक करेंगे या राज्य इस विधान के साथ, समगति से, अपने स्वयं के राज्यों में समान विधान बनाएंगे तथा इस विधि के उपबंधों को अपने क्षेत्रों में लागू करेंगे। श्रीमान् जी, अतः मेरा यह विचार है कि इस संशोधन से विधेयक अधिकारातीत हो जाएगा और इसीलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता।