2. संविधि पुनरीक्षण समिति की नियुक्ति - Page 24

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देशी रियासतों के मध्य किए गए थे। जैसा कि मैंने कहा, वे पूर्णतया संविदात्मक होते हैं इनसे भारत सरकार को, ऐसी कोई अधिकारिता प्रदत्त नहीं होती जिससे वह या तो उन व्यवस्थाओं में परिवर्तन करके या उन्हें किसी विधि का आधार बनाकर कोई ऐसा विधान बना सकें जो देशी रियासतों को आबद्ध करें। अतः, जहाँ तक हमारा संबंध है, इस विधानमंडल द्वारा केई ऐसी विधि बनाने के विषय में, जिसे देशी रियासतों पर लागू करना उद्धिष्ट हो, मेरे विचार में यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हम ठहराव करार का आश्रय नहीं ले सकते। अतः हमें अंगीकार पत्रों का अवलंब लेना चाहिए तो एकमात्र ऐसा आधार है जो हमें कोई भी विधि पारित करने की कानूनी अधिकारिता प्रदान करता है। मेरा निवेदन है कि यदि आप अंगीकार पत्रों को उन अंगीकार पत्रों को अपनाते हैं जो जैसे वे अब विद्यमान हैंµऔर मैं सदन को स्पष्ट करूँगा कि मैं ‘जैसे वे अब विद्यमान हैं’ शब्दों पर बल क्यों दूता हूँ तो इस सदन को कोई अधिकारिता प्राप्त नहीं हैं। प्रथमतः यह विधान समवर्ती क्षेत्र में प्रविष्टि सं. 16 से संबधित है। जहां तक विधान के विषय का संबंध है, यह फेडरल सूची या प्रांतीय सूची से संबंधित नहीं है। यह केवल समवर्ती सूची से संबंधित हैं। अब, जैसा कि प्रत्येक व्यक्ति जानता है, अंगीकार पत्रों द्वारा कानून बनाने की जो शक्तियां केन्द्रीय विधानमंडल को दी गई हैं, वे निश्चित रूप से समवर्ती सूची में सम्मिलित सभी मदों को अपवर्जित करती हैं। मुझे यह सोचना चाहिए था कि इस प्रतिपादना द्वारा कि समवर्ती सूचियाँ अंगीकार पत्रों के अंतर्गत नहीं आती हैं, इस सदन की अधिकारिता पूर्ण रूप से अपवर्जित है। अतः हमें मात्र इस बात का पता लगाना है कि क्या अंगीकार पत्रों के अन्तर्गत जो विभिन्न राज्यों द्वारा भारत संघ के पक्ष में परित किए गए हैं, ऐसा कुछ आता है जो समवर्ती सूची में प्रविष्टि सं. 16 से संबंधित है या उसके समतुल्य है। अब, श्रीमान् जी, ये अंगीकार पत्र सदन के पटल पर रख दिए गए हैं, और किसी भी व्यक्ति ने, जिसके पास उनकी समीक्षा करने के लिए समय हो, यह देख लिया होगा कि राज्यों ने केवल तीन विषयों की बाबत स्वीकृति दी है, और इनमें से किसी भी विषय का निर्वचन ऐसे नहीं किया जा सकता कि समवर्ती सूची में मद संख्या 16 जैसी किसी मद को शामिल किया जा सके। अतः मेरा निवेदन है कि यदि हमें अंगीकार पत्रों का अवलंब लेना हो तो भी यह सदन उन अंगीकार पत्रों से कोई अधिकारिता प्राप्त नहीं कर सकता। मेरे माननीय मित्र श्री अनन्तसयनम् अय्यंगर ने इस कठिनाई को स्पष्ट रूप से समझा है और एक प्रतिपादता प्रस्तुत की है जो, उनके अनुसार देशी रियासतों तक विधान का विस्तार करने के लिए इस सदन द्वारा अपनाई जा सकती है। उनकी प्रतिपादना यह थी कि इस सदन द्वारा अनेक विधान पारित किए गए हैं जो प्रारंभ में कतिपय क्षेत्रों तक समिति थे, उदाहरण के लिए किसी प्रांत या जिला या किसी अन्य लघुत्तर क्षेत्र तक, और विधेयक में एक खंड सम्मिलित था जिसने कार्यपालिका को, अधिसूचना द्वारा उस विशिष्ट विधान को ऐसे अन्य क्षेत्रों तक विस्तारित करने में समर्थ बनाया था जिन्हें मूलतः विधेयक में सम्मिलित नहीं किया गया था। अब वह प्रतिपादना,