286 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक
सदन मध्याह्नोपरांत तीन बजे पुनः समवेत हुआ
(पंडित ठाकुर दास भार्गव पीठासीन)
ऽश्री जवाहर लाल नेहरू (प्रधान मंत्री एवं विदेश मंत्री)ः मैं प्रस्ताव पेश करने की अनुमति चाहता हूँः
फ्कि भारत के संविधान का संशोधन करने के लिए विधेयक एक प्रवर समिति को जिसमें प्रो. के.टी. शरद, सरदार हुकम सिंह, पण्डित, हृदय नाथ कुंजरु, डॉ. श्यामाप्रसाद मुकर्जी, श्री नज़ीरुद्दीन अहमद, श्री सी. राजागोपालाचारी, श्री एल. कृष्णास्वामी भारती, श्री अवधेश्वर प्रसाद सिन्हा, श्री टी.आर. देवगिरीकर, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, श्री वी. एस. सरवटे, श्री मोहन लाल गौतम, श्री आर.के. सिधवा, श्री खाण्ड भाई के. देसाई, श्री के. अनुमन्धैया, श्री राजबहादुर, श्रीमती जी. दुर्गाबाई, श्री मणिलाल चतुरभाई शाह, श्री देवकान्त बरुआ, श्री सत्यनारायण सिन्हा, और प्रस्तावक सम्मिलित हों, इन अनुदेशों के साथ भेजा जाए कि वे अपना प्रतिवेदन सोमवार 21 मई, 1951 तक दे दें।य्
यह विधेयक बहुत जटिल नहीं है_ न ही यह बहुत बड़ा है। तथापि, मझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि यह बहुत महत्वपूर्ण है। संविधान से सम्बन्धित कोई भी बात और उसके परिवर्तन का महत्व है। संविधान में सम्मिलित मूल अधिकारों से सम्बन्धित किसी बात का और भी अधिक महत्व है। अतः इस प्रस्ताव को मैं और सरकार किसी जल्दबाजी, या हल्केपन से नहीं, बल्कि इस समस्या पर पूरे ध्यान से चिन्तन मनन और छानबीन करने के बाद लाए हैं।
मैं सदन को बता दूँ कि हम कई महीनों से इस विषय पर विचार कर रहे हैं। लोगों, राज्य सरकारों, प्रान्तीय सरकारों के मन्त्रियों और जब कभी भी मौका मिला। इस सदन के कई सदस्यों से परामर्श करते रहे हैं और इस विषय को विभिन्न समितियों आदि के पास भी विचारार्थ भेजते रहे हैं तथा विधि विशेषज्ञों की भी आवश्यकतानुसार सलाह लेते रहे हैं, ताकि हम इस विषय में यथासम्भव सावधानी बरत सकें। इतना ध्यान देने क बाद हम इस विधेयक को लाए हैं, क्योंकि हम समझते हैं कि इस विधेयक में वर्णित संशोधन न केवल आवश्यक हैं बल्कि वांछनीय भी हैं। और यदि ये परिवर्तन नहीं किए गए तो सम्भवतः बहुत बड़ी कठिनाइयां हमारे सामने ही नहीं आएंगी, जैसा कि पिछले कुछ महीनों में हुआ भी है, बल्कि इस संविधान के कई मुख्यः उद्देश्य भी पूरे नहीं होंगे
ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 16 मई, 1951, पृष्ठ 8814-15