33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 302

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अथवा उनमें विलम्ब हो जाएगा। एक तरह से इस विषय का उल्लेख अस्पष्ट रूप से किया गया है और यह विषय कुछ समय से जनता के सामने हैं। परन्तु यह विषय जो इस विधेयक में उठाया गया है, तभी सामने आया जब मैंने कुछ दिन पहले इस विधेयक को सदन में प्रस्तुत किया था।

ऽऽपण्डित कुंजरु (उत्तर प्रदेश)ः यह विधेयक बहुत सरल लगता है परन्तु इसका प्रभाव निःसंदेह दूरगामी है। इसका प्रभाव केवल संविधान पर ही नहीं है, बल्कि संविधान से सम्बन्धित भावना पर भी है। इतने महत्वपूर्ण विधेयक पर पूरे ध्यान से विचार करने की आवश्यकता है और मेरे विचार में पूर्व वक्ताओं ने इसकी जो संवीक्षा की है, हमें उसका स्वागत करना चाहिए। संविधान में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन किए जा रहे हैं उनका स्वागत करना चाहिए। संविधान में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन किए जा रहे हैं उनका औचित्य स्पष्ट करने के लिए सरकार को हमें यह बताने के लिए कि प्रत्येक संविधान की आवश्यकता क्यों है, प्रत्येक बिन्दु पर पूरी जानकारी देनी चाहिए थी। प्रधानमंत्री इस पर काफी विस्तार से बोले, किन्तु आमतौर पर सिद्धान्तों तक ही सीमित रहे। विशिष्ट मामलों पर चर्चा करते हुए उन्होंने उन कारणों पर प्रकाश नहीं डाला, जिनके लिए सरकार ने इस विशिष्ट विधेयक को हमारे सम्मुख रखा है। इसीलिए सरकार के किसी अन्य सदस्य को हमें और अधिक जानकारी देनी चाहिए थी। सम्भवतः मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर इस विधेयक के उपबंधों के सम्बन्ध में, विशेषकर उन उपबंधों के सम्बन्ध में, जो अनुच्छेद 19 के संशोधन और दो नए अनुच्छेद 31 क और 31 ख के अन्तःस्थापन से सम्बन्धित हैं, हमें पूरे विस्तार से जानकारी दे सकते थे। वे निःसंदेह इस चर्चा में भाग लेंगे। सम्भवतः वे अन्त में बोलेंगे ताकि इस विषय के सम्बन्ध में अन्तिम बात कह सकें।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः नहीं, नहीं।

पंडित कुंजरुः यही उनके लिए और सरकार के लिए, जिसके वे एक महत्वपूर्ण सदस्य हैं, उचित होगा। किन्तु यह इस सदन के साथ बहुत अन्याय होगा कि इसे कहा जाए कि........

श्री सिधवा (मध्य प्रदेश)ः इसमें अन्याय की क्या बात है?

पंडित कुंजरुः यदि श्री सिधवा थोड़ा धीरज से काम लें तो वह यह समझ लेंगे कि प्रत्येक सदस्य उन जैसा प्रबुद्ध नहीं है और अधिकांश सदस्यों को थोड़ी और अधिक जानकारी की आवश्यकता होगी......

ऽऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 17 मई, 1951, पृष्ठ 8896