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उस संसदीय कानून की धारा 2 ने डोमिनियन विधानमंडल को उन विषयों के संबंध में विधि बनाने के लिए अनुमति दी थी जिनके संबध में उसने उस आपात्काल के दौरान बनाई थी। किंतु संसदीय कानून ने केन्द्रीय विधानमंडल को प्रारम्भ में मात्र एक वर्ष के लिए यह शक्ति प्रदान की थी।
उस अधिनियम के उपबंधों के अधीन, केन्द्रीय विधानमंडल ने आवश्यक प्रदाय (अस्थायी शक्तियां) अधिनियम, 1946 और अधिगृहीत भूमि (शक्तियों का जारी रहना) अधिनियम, 1947 नामक अधिनियम पारित किए। वह विधि 1946 में पारित की गई थी। संसदीय कानून के अधीन यह एक वर्ष तक अर्थात् 1947 तक अस्तित्व में बनी रही।
अब, जैसाकि मैं कह चुका हूँ, संसदीय कानून की धारा 4 में यह उपबिंंधत है कि केन्द्र इन शक्तियों का प्रयोग एक वर्ष तक कर सकता है। इसमें यह भी उपबंधित है कि शक्तियों का विस्तार एक और वर्ष के लिए किया जा सकता है यदि गवर्नर जनरल ऐसा प्रमाणित कर दे। परिणामस्वरूप, मेरे द्वारा निर्दिष्ट वे दो अधिनियम एक और वर्ष तक गवर्नर जनरल के आदेश द्वारा अस्तित्व में बने रहेंगे और अब हम गवर्नर जनरल द्वारा प्रदत्त विस्तार के अधीन उन शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं। अब, गवर्नर जनरल द्वारा प्रदत्त विस्तार के अधीन ये 31 मार्च, 1948 तक जारी रहेंगी, इस मामले में यह सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार के विभिन्न विभागों से परामर्श किया गया है कि क्या वे 31 मार्च, 1948 के पश्चात् इन नियंत्रणों के बिना कार्य करते रहेंगे। मुझे विश्वास है कि लगभग सभी विभागों ने, जिनके पास प्रशासनिक नियंत्रण का प्रभार है, यह महसूस किया है कि इन नियंत्रणों को जारी रखने के लिए उन्हें कम से कम एक वर्ष और चाहिए।
जैसा कि मैं कह चुका था, संसदीय कानून की धारा 4 ने प्रारंभ में एक वर्ष के लिए, दूसरी बार गवर्नर जनरल के आदेश पर एक और वर्ष के लिए और उसके पश्चात् इस सदन के संकल्प द्वारा शक्ति प्रदान की थी। अतः स्थिति यह है कि जब तक यह सदन उस शक्ति का विस्तार करने के लिए संकल्प पारित नहीं कर देता, ये शक्तियां 31 मार्च, 1948 को समाप्त हो जाएंगी। जैसाकि सदन को याद होगा, मैं मात्र एक विधि मंत्री हूँ और भारत सरकार के कार्यों के संबंध में मेरी कोई प्रशासनिक जिम्मेदारियां नहीं हैं, और इसीलिए मैं इस स्थिति में नहीं हूँ कि मैं पूछे गए किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर दे सकूँ कि क्या वास्तव में यह विस्तार आवश्यक है। किन्तु मैं सदन को यह बता सकता हूँ कि सभी विभाग सहमत हैं कि यह विस्तार आवश्यक है। और मुझे आशा है कि सदन भारत सरकार के विभागों के विचार को स्वीकार करेगा और इस संकल्प को पारित करेगा। मैंने यह सावधानी बरती है कि मैं अपने मित्र डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी