8. दिवाला विधि (संशोधन) विधेयक - Page 57

42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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ऽदिवाला विधि (संशोधन) विधेयक

विधि मंत्री (डॉ. बी.आर. अम्बेडकर)ः श्रीमन्, मैं प्रस्ताव पेश करता हूँः

फ्कि दिवाला से संबंधित विधि का और आगे संशोधन करने के विधेयक पर विचार किया जाए।य्

4.00 बजे अपराहन

श्रीमन्, सदन को यह समझने में समर्थ बनाने के लिए मैं एक संक्षिप्त कथन करना चाहता हूँ कि वास्तव में विधेयक में क्या किया जाना प्रस्तावित है। भारत में दिवाला विधि दो अलग-अलग अधिनियमों में अंतर्विष्ट हैंः एक एक का नाम प्रांतीय दिवाला अधिनियम है जबकि दूसरे का नाम प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम है। वर्तमान विधेयक में संक्षिप्त नाम के अलावा छह खंड हैं जो विद्यमान दिवाला विधि में संशोधन करते हैं। इस विधेयक के संशोधक खंड दो प्रवगों में आते हैंः कुछ खंड प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम में परिवर्तन करते हैं और अन्य द्वारा प्रांतीय दिवाला अधिनियम में परिवर्तन प्रस्तावित है। प्रांतीय दिवाला अधिनियम में परिवर्तन करने वाले खंड चार हैं_ वे 3 से 6 तक हैं और दो का संबंध प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम से है।

जब हम खंड 2 पर विचार करते हैं तो यह पाते हैं कि इस खंड के द्वारा केवल एक कठिनाई को दूर किया गया है जो लम्बी अवधि से महसूस की जा रही थी। पे्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम की धारा 12 में यथा सम्मिलित वर्तमान विधि में यह कहा गया है कि दिवाला याचिका इस घटना के घटने के तीन मास के भीतर फाइल की जानी चाहिए जिसे याचिका प्रस्तुत करने के लिए न्यायोचित आधार के रूप में मान्यता दी गई है। प्रायः ऐसा होता है कि तीन मास की अवधि का उस समय अंत हो जाता है जब न्यायालय बंद हों। वर्तमान विधि के अन्तर्गत लेनदार मात्र इस कारण से याचिका प्रस्तुत करने का अवसर खो देता है कि जब न्यायालय पुनः खुलता है तब घटना घटित होने के बाद से तीन मास से अधिक हो जाते हैं बेशक न्यायालयों ने, इस मामले में अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाया हो। मद्रास और कोलकाता उच्च न्यायालयों ने अभिनिर्धारित किया है कि अवधि का विस्तार नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि अवधि का विस्तार किया जा सकता है। अतः यह महसूस किया गया कि दोनों ही प्रयोजनों के लिए अर्थात् उल्लेख किए जा सकने वाले अन्याय को दूर करने के लिए, क्योंकि यदि लेनदार अपनी याचिका तीन मास के

ऽसंसदीय वाद-विवाद (जिसे यहाँ इसके पश्चात् सं. वा. कहा गया है।), खंड 1, भाग II, 3 फरवरी, 1950, पृष्ठ 185-93