8. दिवाला विधि (संशोधन) विधेयक - Page 58

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भीतर प्रस्तुत करने में इस कारण से असमर्थ रहा है कि न्यायालय तीन मास के भीतर प्रस्तुत करने में इस कारण से असमर्थ रहा है कि न्यायालय बंद है तो निश्चित रूप से यह उसका दोष नहीं है और दूसरे, विनिश्चयों में टकराव को दूर करने के लिए भी इस संशोधन द्वारा यह प्रस्ताव किया जाता है कि किसी ऐसे मामले में जहाँ अवधि ऐसे दिन समाप्त हो जब न्यायालय बंद है तो याचिका उस दिन प्रस्तुत करना विधिपूर्ण होगा जिस दिन न्यायालय पुनः खुले।

अब मैं खंड 3 पर आता हूँ जो प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम की धारा 21 को संशोधन करता है। धारा 21 न्यायनिर्णय के बातिलकरण से संबंधित है। धारा 21 के अधीन, यद्यपि बातिलकरण की शक्ति न्यायालय को दी गई है, फिर भी मामला न्यायालय के विवेकाधिकार के अंतर्गत ही रहता है। शब्द हैं, फ्न्यायालय कर सकेगा।य् इस तरह यह धारा 21 प्रांतीय दिवाला अधिनियम की धारा 35 के प्रतिकूल हैंः क्योंकि प्रांतीय दिवाला अधिनियम की धारा 35 के अधीन शक्ति आबद्धकर है और शब्द हैµफ्न्यायालय करेगा।य् इसी प्रकार यह पाया गया है कि वर्तमान धारा 21 कुछ सीमा तक अपनी ही धारा 13 के उपखंड (4) से असंगत है। क्योंकि उसमें कहा गया है कि यदि किसी याचिका को खारिज करने के लिए आधार मौजूद हैं तो न्यायालय उसे खारिज करेगा। इसका कोई कारण नहीं है कि बातिलकरण के मामले में शक्ति विवेकाधीन होनी चाहिए और खारिज किए जाने के मामले में शक्ति अनिवार्य क्यों होनी चाहिए। इसीलिए यह महसूस किया गया कि यह वांछनीय होगा कि प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम को प्रांतीय दिवाला विधि के अनुरूप लगाया जाए और फ्कर सकेगाय् शब्दों के स्थान पर फ्करेगाय् शब्द का प्रयोग किया जाए। अब मैं खंड 4 पर आता हूँ। खंड 4 प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम की धारा 53 का संशोधन करता है। धारा-53, किसी दिवालिया की संपत्ति के विरुद्ध किसी ऐसे निष्पादन लेन -दार के अधिकारों से संबंधित है जिसने ऋृणी के दिवालिया न्यायनिर्णीत किए जाने के पूर्व उसके विरुद्ध डिक्री प्राप्त कर ली हो। प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि निष्पादन लेनदार के अधिकारों का लक्ष्य क्या होना चाहिएः क्या लक्ष्य दिवाला की याचिका का प्रस्तुतिकरण और ग्रहण किया जाना होना चाहिए अथवा लक्ष्य न्यायनिर्णयन होना चाहिए। यह महसूस किया गया कि समुचित लक्ष्य, न्यायसंगत लक्ष्य, याचिका का ग्रहण किया जाना होगा_ क्योंकि याचिका ग्रहण किए जाने से अभिप्रेत है कि अन्य लेनदार भी हैं जो ऋृणी की संपत्ति में किसी अंश पर अधिकार रखने के लिए मान्यताप्राप्त भी हैं। अतः पूर्व निष्पादन लेनदार को न्यायनिण् ार्यन की तारीख तक संपत्ति विनियोजित करते रहने के लिए अनुज्ञा देना अनुचित होगा। दिवाला की याचिका ग्रहण किए जाने और न्यायालय द्वारा उसके वास्तविक न्यायनिर्णयन के बीच पर्याप्त समय हो सकता है। अतः यह धारा फ्न्यायनिर्णयनय् शब्द के स्थान पर फ्ग्रहणय् शब्द रखती है।