46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हैं। जैसा हम चाहते थे। यही कारण था कि मैं एकल अधिनियमिति पर कार्य करने की अपनी मूल परियोजना को लंबित रखा। तथापि, मैंने उस परियोजना को छोड़ा नहीं है और जैसे ही इस प्रयोजन के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल होंगी, मैं निश्चित रूप से एकल अधिनियमिति संसद के सामने रखूँगा।
उनके द्वारा उठाए गए दूसरे प्रश्न के संबंध में कि क्या दिवाला में अधिकारिता जिला न्यायालयों की हो अथवा लघु अधिकारिता न्यायालयों की और उनके द्वारा निर्दिष्ट अन्य धाराओं की बाबत् जो उनके अनुसार ऐसी धाराएं हैं जिनका दिवालिया दुरुपयोग करता है, मेरी राय में ये ऐसे विषय नहीं है जिनपर इस अवसर पर चर्चा की जाए। जैसा कि सभी जानते हैं, दिवाला विधि, किसी दुर्भाग्य या अनिष्ट के प्रति एक प्रकार का विधिक अनुतोष है। इसकी पूरी संभावना है कि ऐसे व्यक्तियों को विधिक अनुतोष का फायदा प्राप्त हो जाए जिन्हें नहीं मिलना चाहिए, किंतु यह एक शिकायत है जो केवल दिवाला विधि के विरुद्ध ही नहीं की जा सकती, अपितु यह लगभग सभी विधियों के विरुद्ध की जा सकती है। विधानमंडल के लिए ऐसा उपाय अधिनियमित करना संभव नहीं है जो इतना चुस्त हो कि वह पूरी तरह से सुस्पष्ट और प्रत्यक्ष हो। ऐसे धूर्त व्यक्ति सदैव उपलब्ध रहते हैं जो फायदा उठाने के लिए साधन और मार्ग निकाल लेते हैं और फिर उसका दुरुपयोग करते हैं। तथापि इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि मेरे मित्र श्री दास का यह आशय प्रशंसनीय है कि हमें इस प्रकार की विधि में ऐसा कोई बचाव का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए, जिससे अपात्र व्यक्ति वह अनुतोष प्राप्त करने में समर्थ हो जाएं जिसे विधि का आशय वास्तव में अभागे व्यक्तियों को देना है और भावी विधानों में निस्संदेह इस बात को ध्यान में रखा जाएगा।
जहाँ तक मेरे मित्र श्री करूणाकर मेनन द्वारा उठाए गए मुद्दों का संबंध है, मेरा
ख़्याल है कि वे उन बातों को नहीं समझ पाए जो मैंने प्रारम्भिक टिप्पणियों में कही थीं। वे भूल गए कि वास्तव में हम जो करने का प्रयास कर रहे हैं वह यह है कि या तो प्रांतीय विधि को प्रेसिडेंसी विधि के अनुरूप बनाया जाए या फिर प्रेसिडेंसी विधि को प्रांतीय विधि के अनुरूप बनाया जाए। हम कोई ऐसा अभिनव परिवर्तन नहीं कर रहे हैं जो इन दोनों अधिनियमों में से किसी में पहले से मौजूद न हो। यदि उन्हें प्रांतीय अधिनियम की कुछ धाराओं में समाविष्ट फ्करेगाय् शब्द पसंद नहीं है और फ्सकेगाय् शब्द चाहते हैं तो उन्हें इस बात के लिए भी अपना औचित्य देना होगा कि फ्करेगाय् शब्द प्रांतीय विधान में क्यों जारी रखा जाए। मैंने केवल इतना किया है कि दोनों अधिनियमों में अनुरूपता लाई जाए ताकि इस प्रकार के विधानों में कोई स्पष्ट असंगतता न हो। जैसाकि मैं कह चुका हूँ, यदि उनके पास अब भी विवाद का कोई मुद्दा है तो वे इस सब को समेकित करने वाले नए विधेयक को विधानमंडल के समक्ष लाए जाने के समय उसे उठा सकते हैं। अभी वे केवल अत्यावश्यक संशोधन हैं जिन्हें दोनों ने अर्थात् प्रांतीय सरकारों ने और, यदि मैं ऐसा कह सकता हूँ तो, सभी उच्च न्यायालयों ने स्वीकार कर लिया है।