8. दिवाला विधि (संशोधन) विधेयक - Page 60

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में यह उपबंधित है कि न्यायनिर्णय के आदेश के साथ-साथ न्यायालय याची के उन्मोचन की तारीख भी नियत करता है और उससे उस दिन हाजिर होने की अपेक्षा करता है जिसको उसे उन्मोचित किए जाने की तारीख नियत की गई है। अब शब्द ये हैं, फ्वह हाजिर होगा और यदि वह हाजिर नहीं होता है तो न्यायालय कार्यवाही करेगाय् जैसाकि उसमें कथित है। जहाँ तक शब्दों का संबंध है, यह धारा आज्ञापक है किंतु किनी विचित्र बात है कि न्यायालयों ने फ्करेगाय् शब्द को फ्सकेगाय् बनाकर इसे विवेकाधीन बना लिया है। ऐसा महसूस किया जाता है कि संभवतः न्यायालयों ने ‘करेगा’ को ‘सकेगा’ समझकर वस्तुतः विधानमंडल के आशय को क्रियान्वित किया है। इसी प्रकार प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम में भी फ्सकेगाय् शब्द है न कि फ्करेगाय्। अतः यह संशोधन न्यायालय के विनिश्चय या निर्वचन को स्वीकार करने और फ्करेगाय् को फ्सकेगाय् से प्रति स्थापित करना प्रस्तावित करता है। विधेयक में यही सारे खंड हैं।

मैं यह कहना चाहूँगा कि ये संशोधन बहुत समय से अपेक्षित हैं। इन संशोधनों का सुझाव बहुत पहले दिया गया था, वास्तव में युद्ध के पूर्व, किंतु युद्ध के होते हुए कोई भी विधान बनाना संभव नहीं था। परिणामतः यह विलंब हुआ। मैं सदन को यह बताना चाहूँगा कि इन संशोधनों का अनुमोदन प्रांतीय सरकारों द्वारा कर दिया गया है और प्रातीय सरकारों ने यह भी कहा है कि यद्यपि दिवाला विषय समवर्ती सूची के अंतर्गत आता है, फिर भी यह वांछनीय है कि इन संशोधनों को संसद द्वारा बनाई गई विधि से किया जाए जिससे कि देश भर में इनमें एकरूपता हो। इसी कारण यह विधेयक लाया गया है।

माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव पेश किया गयाः

फ्कि दिवाला से संबंधित विधि का और आगे संशोधन करने के विधेयक पर विचार किया जाए।य्

ऽडॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं प्रसन्न हूँ कि मेरे मित्र श्री विश्वनाथ दास ने ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिनका उल्लेख उन्होंने अपने भाषण के दौरान किया था। मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस विधेयक को प्रस्तुत करने से पूर्व मेरी भी यही राय थी कि समय आ गया है जब इन दोनों अधिनियमितियों को एक ही अधिनियम में समामेलित किया जाए। प्रे्रसिडेंसी नगरों और अन्य क्षेत्रों के बीच हमारी दिवाला विधि में विद्यमान अन्तर अब मुझे न्यायोचित प्रतीत नहीं होता। किंतु मैं देखता हूँ कि दो अधिनियमों का एक अधिनियमिति में समामेलन करने में समय लगेगा और इसके लिए एक विशेष अभिकरण भी अपेक्षित होगा जिसे धाराओं के मिलान के प्रयोजन के लिए विधि विभाग में नियोजित किया जाएगा। तथापि, वित्तीय समीओं के कारण मेरे लिए उन कर्मचारियों की व्यवस्था करना संभव नहीं हो पाया जो इस कार्य को उतनी तत्परता से करने के लिए आवश्य

ऽसं. वा., खंड 1, भाग II, 3 फरवरी, 1950, पृष्ठ 191-93