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के विचारण के लिए विशेष अधिकरण गठित किए गए थे। वे अधिकरण विभाजन से पूर्व संयुक्त भारत के विभिन्न प्रांतों में पूरे भारत में फैले हुए थे। इन अधिकरणों को, कुर्की आदेश पारित करके अपचारी की संपत्ति को अवरुद्ध करने की शक्ति दी गई थी एवं इस प्रकार सशक्त किए गए न्यायालय ऐसे न्यायालय थे जिनकी अधिकारिता के भीतर अपचारी रहते या कारबार करते थे।
विभाजन के पश्चात्, एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हुई अर्थात् के अधिकरण, जिन्होंने अपचारियों की संपत्तियों के विरुद्ध कुर्की के आदेश पारित किए थे, पाकिस्तान का भाग बन गए जबकि अपचारियों की संपत्तियाँ भारत में ही रहीं। इस कठिनाई ने काफी सीमा तक इन विचारणों की कार्यवाहियों पर रोक लगा दी। अतः अब यह प्रस्तावित है कि ऐसी संपत्ति के संबंध में जिसकी पहले ही न्यायालयों द्वारा कुर्की की जा चुकी हैं (जो अब दुर्भाग्यवश पाकिस्तान में हैं) आगे आदेश पारित करने की शक्ति भारतीय गणराज्य के भीतर क्रियाशील न्यायालयों को अंतरित की जानी चाहिए। परिणामस्वरूप, इस धारा 9-क को जोड़ा जाना वांछनीय समझा गया जो ऐसे न्यायालयों को, जिनकी अधिकारिता के भीतर अब अपराधों का विचारण किया जा रहा है, इन अपचारियों द्वारा धारित संपत्ति के संबंध में आदेश पारित करने की शक्ति का प्रयोग करने के लिए अनुज्ञा देती है।
अध्यादेश इसलिए प्रख्यापित किया गया था क्योंकि विषय को अत्यावश्यक समझा गया था। चूंकि अध्यादेश जारी रखने की शक्ति सीमित अवधि के लिए है, इसलिए उपाय के माध्यम से, समय समाप्त होने से पूर्व अध्यादेश का पुनरीक्षण आवश्यक है।
माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव पेश किया गयाः
फ्कि दंड विधि (संशोधन) अध्यादेश, 1944 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्
श्री हिमत सिंगका (पश्चिम बंगाल)ः जानकारी के मुद्दे पर क्या मैं यह जान सकता हूँ कि क्या न्यायालय के आदेश से कुर्क की गई संपत्ति अब पाकिस्तान में है। यदि संपत्ति वहाँ रहती है......
डॉ. अम्बेडकरः संपत्ति यहाँ है।
माननीय अध्यक्षः प्रश्न यह हैः
फ्कि दंड विधि (संशोधन) अध्यादेश, 1944 का और आगे संशोधन करने के विधेयक पर विचार किया जाए।य्
अध्यक्ष महोदयः प्रश्न यह हैः