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( vi ) अनुसूची की मद (87) में ‘‘अरुप्पुकोटाई’’ शब्द के स्थान पर ‘‘अरुप्पपुकोटाई
नगर पालिका’’ शब्द रखे जाएं;
( vii ) अनुसूची की मद (93) में ‘‘देवाकोटाई ग्रामीण (एरावसेरी)’’ शब्दों और
कोष्ठकों के स्थान पर ‘‘देवाकोटाई नगरपालिका एरावसेरी (ग्रामीण)’’ शब्द
और कोष्ठक रखे जाएं; और
( viii ) अनुसूची की मद (95) में, ‘‘केपारपटनम (मानामथुराई पंचायत बोर्ड)’’
शब्दों और कोष्ठकों के स्थान पर ‘‘केपारपटनम, मानामदुराई पंचातय’’
शब्द रखे जाएं।
-(डॉ. अम्बेडकर)
माननीय उपाध्यक्ष : मद्रास से संबंधित राष्ट्रपति संशोधन आदेश सदन द्वारा स्वीकष्त संशोधनों की सीमा तक परिवर्तित हो जाता है।
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पंडित कुंजरू (उत्तर प्रदेश) : इतना पर्याप्त नहीं है कि राष्ट्रपति द्वारा परिवर्तन करने वाला आदेश सदन, के समक्ष रखा जाए और न ही यह पर्याप्त है कि मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर को उनमें आगे परिवर्तन प्रस्तावित करने चाहिए। हम यह जानना चाहेंगे कि क्या ये परिवर्तन आवश्यक हो गए हैं। निर्वाचन क्षेत्र, जैसे उनका सीमांकन किया गया है, मैं समझता हूँ व्यापक समाधान देते हैं और हमें इसलिए उनमें परिवर्तन करने के लिए सावधान रहना चाहिए। यदि मेरे माननीय मित्र विधि मंत्री मुझे संक्षेप में कारण बताएं जिनसे उत्तर प्रदेश के संसदीय और विधानमंडल निर्वाचन क्षेत्रों में परिवर्तन आवश्यक हो गए हैं। हमारे लिए यह विनिश्चित करना संभव होगा कि क्या हमें उनके पक्ष या विपक्ष में मत देना चाहिए किंतु इस समय हम बिल्कुल बेबस हैं। हम सब नहीं जानते कि हमें क्या करना है।
डॉ. अम्बेडकर : मेरे पास मेरे माननीय मित्र पंडित हृदय नाथ कुंजरू के विरुदध नियमापत्ति उठाने के लिए कोई कारण नहीं है क्योंकि निस्संदेह हममें से प्रत्येक को निर्वाचन क्षेत्रों के बनाने में किसी प्रकार का राजनैतिक गोलमाल अनुज्ञात करने के विरुद्ध बहुत सावधान रहना चाहिए और यदि इस बारे में कोई संदेह है कि कोई विशिष्ट दल निर्वाचन क्षेत्र के परिवर्तन की कूट चाल चल रहा है, जो कि पहले ही राष्ट्रपति द्वारा विहित और सदन द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है तो हमें सदन में उठाया जाना विधि सम्मत है। किंतु मैं अपने माननीय मित्र को, जहाँ तक मेरी