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संसद निरर्हता निवारण विधेयक
* विधिमंत्री (डॉ. अम्बेडकर) : मैं यह प्रस्ताव रखने का अनुरोध करता हूँः-
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‘‘कि कतिपय लाभ के पदों के बारे में यह घोषित करने के लिए कि उनके धारक संसद सदस्य होने के कारण, निरर्हित नहीं होंगे, विधेयक पर विचार किया जाए।’’
महोदय, यह विधेयक वास्तव में कतिपय उन व्यक्तियों के लिए संरक्षण अधिनियम है जो, यदि यह विधेयक प्रवर्तन में नहीं लाया जाता है तो, संविधान के अनुच्छेद 102 के उपबंधों के अधीन संसद सदस्य होने के लिए निरर्हित हो जाएंगे, जो यह कहता है कि यदि कोई व्यक्ति लाभ का पद धारण करता है तो संसद का सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा। दुर्भाग्यवश, ऐसा हुआ कि ऐसे संसद सदस्य हैं जो, उन कारणों से, जिनका मैं अतिसंक्षेप में उल्लेख करूंगा, अनुच्छेद 102 के उपबंधों के अधीन आ गए थे। उन कारणों से जो मैं सदन के समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, सरकार महसूस करती है कि यही ठीक है यह निरर्हता संसद द्वारा निर्मित विधि द्वारा हटाई जानी चाहिए।
लाभ के पद के प्रश्न के संबंध में सदन को यह याद रखना आवश्यक है कि यह उपबंध बहुत पुराना है और इसे भारत सरकार के उन अनेक अधिनियमों में समाविष्ट किया गया था जिनके द्वारा इस देश के संविधान की नींव रखी गई थी। केवल 1935 के अधिनियम से शुरू करते हैं। उसमें धारा 26 विद्यमान थी जो संघीय सरकार के अधीन लाभ के पद धारकों से संबद्ध मामलों के विषय में थी, चूंकि 1935 के अधिनियम का संघीय भाग लागू नहीं हुआ था इसलिए वह धारा उस समय विद्यमान केन्द्रीय विधानमंडल पर लागू नहीं होती थी, किन्तु धारा 69, जो प्रांतीय भाग में उपबंध थी प्रांतीय विधानमंडलों पर लागू होती थी।
जैसा कि सदन को ज्ञात है, संविधान के प्रारूपण के प्रयोजनार्थ 1946 में एक संविधान सभा बुलाई गई थी। उस संविधान सभा में, संविधान बनाने के विषय पर
* संसदीय वाद-विवाद (वि.) वि., जिल्द-14, भाग-2, 7 अगस्त, 1951, पृष्ठ 34-40