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संभव सर्वोत्तम सलाह प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए, ऐसे सभी व्यक्तियों को एक साथ लाना आवश्यक था जो ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर अपनी सलाह देने के लिए अर्हित थे, और यह महसूस किया गया कि यह वांछनीय नहीं होगा कि इस प्रतिबंध को संविधान सभा की सदस्यता पर अधिरोपित किया जाए, और हुआ यह कि परिणामस्वरूप इसे नई परिस्थितियों के अनुरूप बनाने के लिए भारत शासन अधिनियम को अनुकूलित किया गया, तथा इस उपबंध को अनुकूलित भारत शासन अधिनियम, 1935 में से निकाल दिया गया। परिणामस्वरूप, कोई भी सदस्य संविधान सभा का सदस्य बन सकता था और जैसा कि सदन को भी ज्ञात है, संविधान सभा ने भी डोमिनियम विधानमंडल के रूप में कार्य किया इसलिए ऐसे व्यक्ति संसद के सदस्य बने रह सकते थे, भले ही वे लाभ का पद धारण किए हों।
ऐसी स्थिति में, जो हुआ वह यह था कि कुछ सदस्य जो संविधान सभा के सदस्य थे और जो संविधान सभा के सदस्य होने के साथ-साथ डोमिनियन विधानमंडल के भी सदस्य थे, किसी प्रकार की सांविधानिक पाबंदी अधिरोपित हुए बिना, लाभ के पदों पर बने रहे और एक बार जब वे अनुकूलित 1935 के भारत शासन अधिनियम के अधीन लाभ के पदों पर आसीन रहे तो वे 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हो जाने के बाद भी उन पदों पर बने रहे। निःसंदेह, सरकार के लिए उन सदस्यों को यह सूचित करना संभव था कि अब कानून बदल गया है और लाभ का पद निरर्हता बन गया है इसलिए यह उनके हित में है कि वे उन पदों को छोड़ दें जिनके कारण वे इस पाबंदी के अधीन आते हैं। किन्तु संसद सदस्य प्रत्यक्षतः यह महसूस करेंगे कि इससे एक बहुत बड़ी प्रशासनिक कठिनाई उत्पन्न हो जाती। सदस्यों ने पहले ही आयोग के सदस्यों और समितियों के सदस्यों के रूप में अपने ऊपर एक जिम्मेदारी ले रखी थी और उनके कार्यकाल के बीच में उन्हें यह बताया गया कि उन्हें अपना पद छोड़ना होगा और आयोग तथा समिति का गठन इस प्रकार किया जाए कि उनका हर सदस्य इस प्रतिबंध से मुक्त रहे। इससे प्रशासनिक दृष्टि से बहुत बड़ी कठिनाई उत्पन्न हो जाएगी। परिणामस्वरूप इस बात के होते हुए भी कि अनुच्छेद 102 में समाविष्ट पाबन्दी प्रवर्तित हो गई है उन्हें अपने पदों पर काम करते रहने दिया गया। इस विधेयक को लाने का यह एक औचित्य है : क्योंकि यदि आयोग और समितियों के बहुत से सदस्यों को पद छोड़ने के लिए कहा जाता तो इससे बहुत बड़ी प्रशासनिक कठिनाई उत्पन्न हो जाती। अतः इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि उन सदस्यों के अपने पदों पर बने रहने और अपने कार्यों का निर्वहन करने की अनुमति देना सरकार के हितों में था। इसलिए उस निरर्हता को दूर करने के लिए सरकार निःसंदेह बाध्य थी जो वास्तव में उत्पन्न हो गई थी, जिसके लिए वे वस्तुतः उत्प्रेरित किए गए हैं। यह एक कारण है जिसकी वजह से यह विधेयक लाया गया है।