वर्ष 1948-49 (न्याय प्रशासन) के लिए पूरक अनुदानों की माँग - Page 209

192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(घ)
* वर्ष 1948-49 (न्याय प्रशासन) के लिए पूरक अनुदानों की माँग
वर्ष 1948-49 (न्याय प्रशासन) के लिए पूरक अनुदानों की माँग

माननीय उपाध्यक्ष : मैंने सोचा है कि मुझे पहले माननीय मंत्री महोदय को मांग संख्या 34 का उत्तर देने के लिए बुलाना चाहिए था। मुझे इस पर मतदान कराना पड़ेगा। मैं समझता हूँ कि माननीय सदस्य इस बारे में कुछ बोलना चाहते थे। श्री आर. के. सिधवा : नहीं, महोदय।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री) : महोदय, ‘न्याय प्रशासन’ की मद

वास्तव में गृह मंत्रालय की है क्योंकि इस विषय का प्रभार उन्हीं के जिम्मे है परन्तु मुझे विश्वास है, हमें कम से कम आज सरकार को बहस का उत्तर देने की इस मुसीबत से मुक्त कर देना चाहिए। इसीलिए मैंने यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है। मुझे एक बात और बतानी है कि मैंने गृह मंत्रालय के साथ कोई सलाह मशविरा नहीं किया है इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि जो विचार मैं रखने जा रहा हूँं वे वास्तव में गृह मंत्रालय के भी विचार होंगे।

महोदय कानूनी मामलों में देरी होने का सवाल बहुत पुराना है जो इस देश में उठता रहता है और भारत सरकार भी इससे अवगत है। यदि मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो एक बार ‘सिविल न्याय समिति’ नाम की एक समिति का गठन किया गया था और उस समिति द्वारा की गई सिफारिशों को नागरिक प्रक्रिया संहिता के साथ-साथ दंड प्रक्रिया संहिता में इस उद्देश्य से शामिल किया गया था कि मुदकमों के निर्णय लेने में होने वाले विलम्ब से बचा जा सके। लेकिन दुर्भाग्यवश कानूनी प्रक्रिया में होने वाली विलम्ब संबंधी शिकायत ज्यों की त्यों बनी रही और आज भी हमारे सामने हैं। मेरे निर्णय में और मेरे विचार में, (मेरे) दोनों माननीय, मित्र, डॉ. पी. एस. देशमुख और श्रीमती दुर्गाबाई, जिन्हें न्यायालयों में कार्य करने का काफी तजुर्बा है, इस बात से सहमत होंगे कि मुकदमों की सुनवाई में होने वाले विलंब के असली जिम्मेदार खुद मुवक्किल होते हैं। जहाँ तक मेरे अनुभव में देखने में आया है, जब न्यायालय द्वारा किसी भी मुवक्किल को किसी निर्धारित तारीख को, गवाह अथवा दस्तावेजों अथवा किसी अन्य सामान जो कि न्यायालय द्वारा जारी किया गया था, को साथ लेकर आने के लिए बुलाया जाता है तो वह खाली हाथ न्यायालय में आकर गुहार करता

* संविधान सभा (विधायी) वाद-विवाद, खंड-3, भाग- II, 31 मार्च, 1949, पृष्ठ 2151-53