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चुका है और जो आजकल लागू नहीं है तथा अन्य कानून जिनकी स्थिति भी वैसी ही है। वास्तव में, देखा जाए तो इसका मुख्य उद्देश्य बेमतलब और अनावश्यक कानूनों को कानूनों की पुस्तक से अलग करना है। हमारे देश में मैं देखता हूँ कि स्टेट्यूट लॉ डिवीजन कमेटी का गठन सन् 1921 में किया गया था। यद्यपि भारत सरकार द्वारा जब इस समिति का गठन किया गया था तो उसका आशय वही था जो ब्रिटिश स्टेट्यूट में लेखबद्ध था, फिर भी इसके कार्य में थोड़ी भिन्नता थी और यह वह थी कि इस समिति का कार्य स्वयं उनके द्वारा ड्राफ्ट किए गए कतिपय कानूनों पर सरकार को सुझाव देना था। मैं नहीं जानता कि इस प्रकार का कार्य आवश्यक है क्योंकि कानून तैयार करने का कार्य पूर्णतः सरकारी मामला है। उस कानून के प्रारूपण का कार्य प्रारूपकार का है। प्रारूपकार विधि विभाग में कार्यरत रहते हैं। मुझे इस दृष्टिकोण से विधि पुनरीक्षण समिति की कोई खास आवश्यकता प्रतीत नहीं होती बल्कि देखा गया है कि विधि विभाग कर्मचारियों की कमी के कारण किसी व्यक्ति को यह देखने के लिए नियुक्त नहीं कर सकता कि कौन से कानून बेकार हो गए हैं, कौन से अनावश्यक हैं और कौन से आजकल लागू नहीं हैं। तथापि जब कभी सरकार इस प्रश्न पर विचार करेगी तो मैं इस सुझाव को ध्यान में रखूंगा।
फेडरल कोर्ट के बारे में प्रश्न किया गया है कि न्यायाधीशों की अल्प संख्या के कारण न्यायालय में मामले लंबित पड़े हुए हैं। एक प्रश्न यह भी उठाया गया था कि फेडरल कोर्ट के पास एक ऐसी पुस्तकालय भी नहीं है जिसे उसके पास होना चाहिए। मुझे इस बात में रत्ती भर भी संदेह नहीं है कि भारत सरकार फेडरल कोर्ट की अपेक्षाओं और इसकी पुस्तकालय संबंधी जरूरतों को पूरा करने में कभी शिथिल नहीं हो सकती और मुझे इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि जब फेडरल कोर्ट को उच्चतम-न्यायालय में परिवर्तित किया जाएगा तो इस मुद्दे पर अवश्य ही विचार किया जाएगा। फेडरल कोर्ट को उच्चतम न्यायालय में परिवर्तित होने में ज्यादा समय नहीं बचा है। अतः फेडरल कोर्ट और इसकी पुस्तकालय संबंधी सुविधाओं के लिए जो सुधार संबंधी सुझाव दिए गए हैं उनको लागू करने में उच्.चतम न्यायालय के गठन होने तक ठहरा जा सकता है। मुझे इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि भारत सरकार पुस्तकालय की आवश्यकताओं के साथ-साथ न्यायाधीशों की संख्या, जो न्यायालय के कार्यों को निपटाने के लिए आवश्यक है, को ध्यान में रखेगी।
माननीय उपाध्यक्ष : मैं मांगों को सदन के समक्ष रखता हूँ।
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प्रश्न यह है :
‘‘कि गवर्नर जनरल को न्याय प्रशासन के संबंध में 31 मार्च, 1949 को समाप्त होने वाले वर्ष के दौरान की जाने वाली अदायगियों के लिए अधिक से अधिक 2,46,000/- रुपए की पूरक धनराशि दी जाए।’’
प्रस्ताव अंगीकृत हुआ।