वर्ष 1948-49 (न्याय प्रशासन) के लिए पूरक अनुदानों की माँग - Page 211

194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ने यह कहा है कि उनके सामने जो भी मामले रखे जाएं, उनका मुद्रित रिकार्ड रखा जाए, उसी प्रकार उच्च न्यायालय को भी इस नियम का पालन करना होगा। हो सकता है, इस बारे में उच्चतम न्यायालय किसी भिन्न नियम का पालन करता हो, हम नहीं कह सकते।

जहाँ तक निचली अदालतों का सवाल है, वहाँ पर सुधार की काफी गुंजाइश है। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ और हमारे न्यायालयों का भी यही कहना है कि जिन कस्बों में अवर न्यायाधीश (सब जज) बैठते हैं कभी-कभी गांवों से बहुत दूर होते हैं और गांव वालों को वहाँ तक पहुंचने के लिए यात्रा पर बहुत धन खर्च करना पड़ता है। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि अच्छा हो यदि हमारे अवर न्यायाधीश (सब जज) अथवा इनके अधीनस्थ अन्य न्यायाधीश सर्किटों में जाएं। आप छह या सात गांवों के लिए एक सर्किट बना सकते हैं जहाँ ये न्यायाधीश अलग-अलग सप्ताहों के दौरान अलग-अलग सर्किटों में जाकर गांवों में ही मामलों की सुनवाई करें। मैं समझता हूँ कि यह एक व्यावहारिक बात है। यह तो मैं अवश्य ही कहूँगा कि यह एक ऐसा मामला है जो पूरी तरह प्रान्तीय सरकारों के क्षेत्राधिकार में आता है। मेरे सुझाव के अनुसार प्रान्तीय सरकारें ही न्यायपालिका को सुव्यवस्थित कर सकती हैं। यदि वे चाहें तो वे अमूल्य सुझाव को स्वीकार कर सकती हैं।

जहाँ तक न्यायालय शुल्क का सवाल है, मुझे पुनः यही कहना होगा कि यह मामला भी पूर्णत प्रान्तीय सरकारों के क्षेत्राधिकार में आता है। यदि प्रान्तीय सरकारें यह समझती हैं कि निर्धारित किया गया न्यायालय शुल्क मुकदमा दायर करने वालों की क्षमता से बाहर है तो वे न्यायालय शुल्क को कम करके मुकदमा दायर करने वाली जनता को राहत पहुंचा सकती हैं। जहाँ तक कानूनी सहायता का सवाल है, इसमें कोई संदेह नहीं कि इस दिशा में अवश्य ही कुछ किए जाने की जरूरत है। जैसा कि हम सब जानते हैं, ब्रिटिश संसद ने अभी हाल ही में एक अधिनियम पारित किया है जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि मुदकमा दायर करने वाला जो व्यक्ति अपने मुकदमें की सुनवाई के लिए पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं है उसको सहायता प्रदान करना राष्ट्र की जिम्मेदारी है। हालांकि अपने देश के लोगों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए मुझे लगता है कि यह कानून हमारे देश के लिए बहुत उपयोगी है परन्तु देश के राष्ट्रीय राजस्व पर इतना बोझ डालना संभव नहीं हो पाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश के लोगों को जिनके महत्वपूर्ण विधि-प्रश्न तय किए जाने हैं किसी अन्य प्रकार से सहायता दी जा सकती है ताकि उन्हें धन संबंधी आंशिक राहत मिले।

विधि पुनरीक्षण समिति के बारे में कुछ कहा गया था। मुझे लगता है कि इस मामले में कुछ भ्रांतियाँ हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इंग्लैड स्टेट्यूट रिवीजन कमेटी है परन्तु इस का कार्यक्षेत्र अत्याधिक सीमित है। 1927 में पारित किए गए स्टेट्यूट लॉ रिवीज़न कमेटी एक्ट मेरे पास है। इस अधिनियम का उद्देश्य पूरा हो