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के विषय में कुछ नहीं बोला और मैं इस विषय पर कुछ बोलने वाला भी नहीं क्योंकि मेरे और बहुत से अन्य मित्र मुझसे अधिक साधिकार बोल सकते हैं। इसलिए मैं उस विषय के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। लेकिन मैं एक बात कह सकता हूँ, और मुझे कहनी भी चाहिए कि अनुसूचित जातियों, आदिवासी जातियों और आपराधिक जातियों की तुलनात्मक स्थिति के बारे में लोगों के मन में काफी भ्रम है। जहाँ तक अनुसूचित जातियों का संबंध है, उनकी स्थिति इस प्रकार है, वे तैयार हैं-वास्तव में तैयार नहीं है-परंतु वे पहले ही सभ्यता की परिधि में हैं। वे परिधि से बाहर नहीं हैं। वे अवसर की समानता और स्तर की समानता पाने के लिए संघर्षरत हैं। उनकी यही समस्या है। आदिवासी लोगों की समस्या बिल्कुल भिन्न है। वे हिंदू सभ्यता की परिधि से बाहर हैं। इन आदिवासी लोगों के बारे में जिस प्रश्न पर विचार करना है वह यह है : क्या वे हिन्दू सभ्यता के घेरे में आना चाहते हैं और उनके साथ विलय चाहते हैं तथा उसके बाद वे स्तर की समता और अवसर की समता चाहेंगे? मैंने आदिवासी समुदाय के अनेक नेताओं से बात की है- आदिवासी समुदाय के अनेक पुरुषों व महिलाओं से, वे हिंदू सभ्यता के घेरे में बिल्कुल नहीं आना चाहते।
डॉ. श्रीमती सीता परमानंद : प्रश्न......
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : वे इस परिधि से बाहर रहना पसंद करते हैं, वे इसके भीतर नहीं आना चाहते।
जहाँ तक अपराधिक जनजातियों का संबंध है उनकी केवल आर्थिक समस्या है। आप उनको अच्छी आजीविका अर्जित करने के लिये अच्छे अवसर उपलब्ध करवा सकते हैं। यदि उन्हें आजीविका कमाने के अच्छे अवसर मिल जाते हैं तो वे अपराधी नहीं रहेंगे।
अब महोदय, एक प्रश्न यह पूछा गया है। मेरे लिए यह बड़े दुःख की बात है कि हिंदू सभ्यता जो अनेक वर्षों पुरानी है, कुछ लोग कहते हैं कि यह 6
--समाप्त--