372 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हमारे प्रधानमंत्री ने इस विषय में कोई रुचि नहीं ली है। वास्तव में, वह उदासीन ही नहीं है बल्कि अस्पष्श्य जनों के विरुद्ध है। मैंने उनकी जीवनी पढ़ी है और मैंने पाया है कि उन्होंने गांधी को भी भला-बुरा कहा है क्योंकि गांधी जी अनुसूचित जातियों की पृथक मतदाता सूची को समाप्त करने के मामले को लेकर मरने तक को तैयार हो गए थे। उन्होंने अपनी जीवनी में लिखा है-‘‘गांधी इस साधारण-सी समस्या को लेकर क्यों परेशान हो रहे हैं?’’ महोदय, प्रधानमंत्री की बात सुनकर मुझे गहरा आघात पहुंचा-कि वर्ष 1934 में श्री नेहरू ये शब्द कह रहे हैं। मैंने सोचा कि चूंकि सरकार की जिम्मेदारी उन पर आ पड़ी है, हो सकता है उनके विचार बदल गए हों। फिर यह सोचा जो जिम्मेदारी गांधी जी अपने ऊपर लेने को तैयार थे, वह अब नेहरू जी को उठानी चाहिए, परन्तु मुझे उनके मन में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता। महोदय, वर्ष 1952 में, मेरे माननीय मित्र बाबू जगजीवन राम की अध्यक्षता में नागपुर में एक सम्मेलन हुआ था।
मुझे पता चला कि बहुत बड़ा शामियाना लगाया गया था। मंच पर रजत वर्ण की दो कुर्सियाँ रखी गई थी; एक बाबू जगजीवन राम के लिए और एक पंडित जवाहर लाल नेहरू के लिए। उसमें श्रोताओं की संख्या दो सौ या तीन सौ थी और एक हजार पुलिसकर्मी थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू को उस सम्मेलन का उद्घाटन करना था। उनका भाषण इस समय मेरे पास है लेकिन मैं उसे पढ़कर सदन को कष्ट नहीं देना चाहता फिर भी उनका सार यह है। मुझे बताया गया है कि उस सम्मेलन का आयोजन करने के लिए वह बाबू जगजीवन राम से बहुत नाराज थे। वह बड़े ज़ोर से बोले ‘‘मैं इस बात को नहीं मानता कि अस्पृश्य जनों की बहुत बड़ी समस्या है। आर्थिक दृष्टि से गरीब लोगों की आम समस्या है, अस्पृश्य जनों की समस्या भी उसी का हिस्सा है। अन्य समस्याओं के साथ इस समस्या पर भी ध्यान दिया जाएगा इस समस्या पर कोई विशेष ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।’’ महोदय, यदि प्रधानमंत्री इतनी उपेक्षापूर्ण बात करेंगे तो हम शेष कार्यकर्ताओं से, जिन्होंने अपने ऊपर इस समस्या विशेष में रुचि लेने, कर्तव्य करने अथवा जिम्मेदारी निभाने का बीड़ा उठाया है, किस उत्साह की अपेक्षा कर सकते हैं। मेरे विचार में, अस्पृश्यता का उन्मूलन नहीं होगा। उनका विश्वास है कि इसका उन्मूलन हो जाएगा, परंतु मेरे विचार में, नहीं होगा, जैसा कि मैंने पहले कहा है, यह मानसिक ग्रंथि है। इसमें अनेक वर्ष लग जाएंगे। इसके साथ ही हम इस बात को सुनिश्चित करने के लिए आंदोलन क्यों न तेज करें कि अस्पृश्यता का उन्मूलन हो या न हो, परंतु अनुसूचित जातियों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व संवैधानिक अधिकारों को पूरा संरक्षण मिले। इस उद्देश्य के लिए प्रयास अवश्य जारी रहने चाहिएं।
महोदय, मैं एक बात और कहना चाहता हूँ। शायद लोग कहते होंगे कि मैंने अधिकांश समय अनुसूचित जातियों की समस्याओं के संबंध में अधिक बोला है और आदिवासियों