खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 113

96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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  1. समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए सुझाए गए ब्यौरे हिन्दुओं अथवा सिखों द्वारा स्वीकार नहीं किए गए हैं परंतु केंद्रीय विधानमंडल में सिखों द्वारा मांगे गए पूर्ण प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई है।

  2. विभिन्न अल्पसंख्यकों के लिए सीटों का प्रस्तावित वितरण एक पूरी स्कीम है और विस्तृत प्रस्तावों को एक-दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता।

  3. सीटों का यह वितरण इस सिद्धांत के अनुसार है कि किसी भी मामले में बहुसंख्यक समुदाय को समान बराबरी के अल्पसंख्यक की स्थिति तक नहीं लाया जाना है।

  4. वाणिज्य, जमींदारी, उद्योग, श्रम आदि के लिए कोई प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं किया जाता है। इसे पूर्वानुमानित करते हुए कि ये सीटें अंततः सांप्रदायिक हैं और इन हितों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व चाहने वाले समुदाय सांप्रदायिक कोटे से ऐसा कर सकते हैं।

  5. केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों को 33-) प्रतिशत प्रतिनिधित्व की अनुमति इस अनुमान पर आधारित है कि 26 प्रतिशत ब्रिटिश भारत से होंगे और कम से कम 7 प्रतिशत भारतीय रियासतों को समनुदेशित कोटे में से, समझौते द्वारा, होंगे।

  6. पंजाब में मुसलमानों, हिन्दुओं और दलित वर्गों द्वारा सुझाव दिया गया साझा त्याग सिखों को दिए जा रहे 54 प्रतिशत के भारांश की अनुमति देगा, जो उन्हें विधानमंडल में 20 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व देगा।

  7. यह प्रस्ताव 11.5 करोड़ लोगों अथवा भारत की जनसंख्या के लगभग 46 प्रतिशत लोगों द्वारा स्वीकार किया गया माना जा सकता है। *

ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने समझौते के लिए भारतीय प्रतिनिधियों पर विचार करने के लिए अपने तरीके से प्रयास किया। प्रधान मंत्री की पुत्री ने चुने हुए प्रतिनिधियों को पार्टी दी। बड़ौदा के महाराजा, डॉ. अम्बेडकर, सर मिर्जा इस्माइल, जिन्ना, ताम्बे और कुछ अन्यों ने इसमें भाग लिया। ब्रिटिश प्रधान मंत्री कुछ प्रतिनिधियों को चेकर्स में अपने निवास स्थान पर ले गए। उनका वहां भारतीय समस्या से संबद्ध वार्तालाप हुआ, परंतु वहां भी वे कोई समझौता नहीं कर सके।

* यह संघीय संरचना समिति और अल्पसंख्यक समिति की मूल कार्यवाही में परिषिष्ट-3 के रूप

में आया है। पृष्ठ 1394-99 ।