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अल्पसंख्यक उप-समिति ने सम्मेलन को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। उस रिपोर्ट के अंतिम पैरा में दर्ज किया गया था कि ‘‘अल्पसंख्यक और दलित वर्ग अपने वक्तव्य में दृढ़ हैं वे भारत के स्व-डोमिनियन संविधान पर सहमति नहीं दे सकते जब तक कि उनकी मांगे समुचित तरीके से पूरी नहीं की जातीं।
जोशी, जाधव ओर पॉल के समान डॉ. अम्बेडकर मताधिकार उप-समिति के प्रस्तावों से असहमत थे क्योंकि उनकी राय में प्रस्ताव अपर्याप्त थे और उन्होंने तत्काल वयस्क मताधिकार लागू करने की वकालत की। लिखित भाषण में जो वे समय की कमी के कारण नहीं दे सके, डॉ. अम्बेडकर ने ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि अगर मताधिकार को सीमित करते हुए श्रमिक सरकार उन्हें ऐसे लोगों की दया पर छोड़ देती है, जिन्होंने उनके कल्याण में कोई दिलचस्पी नहीं ली है तो यह दलित वर्गों को धोखा देना होगा।
समस्या और अपने लोगों के कल्याण के लिए उनकी सदाशयता और समर्पण ऐसे थे कि डॉ. अम्बेडकर ने दिन-रात कार्य किया, साक्षात्कार लिए, साक्षात्कार दिए, सूचनाएं दीं और यहां तक कि ब्रिटिश संसद के कुछ सदस्यों को अछूतों की समस्या से पूर्णतः अवगत कराने के लिए बैठक को संबोधित किया। उन्होंने विदेशी पत्रिकाओं में लेख भेजा, विदेशी प्रेस को वक्तव्य जारी करने और उस असहनीय प्रताड़नाओं तथा अविश्वसनीय दुख-तकलीफ, जिसके अधीन भारत में युगों से दलित वर्ग जी रहा था, को उजागर करने के एकमात्र उद्देश्य से लंदन में बैठकों को संबोधित करने के अवसर का लाभ उठाया। प्रेस से एक के बाद एक अपील करने के बाद उन्होंने कहा कि भारत में अछूतों के हितों की पूर्ति के लिए जागरूक विश्व की सहायता की आवश्यकता है। इसलिए, उन्होंने आग्रह किया कि मानवता के आधार पर उनकी समस्या के समाधान के लिए सहायता करना सर्वसाधारण लोगों का पवित्र कर्त्तव्य है।
इसका परिणाम यह हुआ कि विश्व पहली बार जान पाया कि भारत में अछूतों का भाग्य अमरीका में नीग्रो लोगों से भी खराब है। अपील से कुछ ब्रिटिश नेता द्रवित हो गए और इसके फलस्वरूप, सुश्री एलिनोर, सुश्री एलेन, नॉर्मन एंजल और कुछ अन्य जैसे ब्रिटिश संसद के कुछ सदस्यों वाले शिष्टमंडल ने लॉर्ड सैंकी की प्रतीक्षा की और दलित वर्गों को मताधिकार देने तथा उनकी निःशक्यताओं को दूर करने की वकालत की। लॉर्ड सैंकी ने वचन दिया कि उनके प्रस्तावित राजनीतिक ढांचे में उन्हें अन्य वर्गों और भारत की जनता के साथ रखा जाएगा। तथापि, कुछ ब्रिटिश समाचार-पत्र डॉ. अम्बेडकर के
* डॉ. अम्बेडकर का दिनांक 21 जनवरी, 1931 का पत्र।