अछूतों के मत पर आश्रित होता। साम्प्रदायिक अधिनिर्णय द्वारा अछूतों को दी गई सीटों से कुछ अधिक सीटें आज उनके पास हैं। लेकिन उनके पास यही सब कुछ है। हर दूसरा सदस्य उग्र नहीं तो उदासीन अवश्य है। यदि दोहरे मतदान की प्रणाली के साथ साम्प्रदायिक अधिनिर्णय वजूद में रहता तो अछूतों को कुछ सीटें अवश्य ही कम मिलतीं लेकिन हर दूसरा सदस्य अछूतों का होता। अछूतों के लिए सीटों की संख्या में वृद्धि वास्तव में कोई वृद्धि है ही नहीं, और न ही पृथक निर्वाचकमंडल और दोहरे मतदान की हानि के लिए कोई क्षतिपूर्ति। हिन्दुओं ने पूना समझौते पर कोई जश्न नहीं मनाया, वे इसे पसंद नहीं करते थे। श्री गांधी का जीवन बचाने के लिए हिन्दुओं में अपने हो-हल्ले के दौरान यह सचेतन अनुभूति अवश्य विद्यमान थी कि उनका जीवन बचाने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकता है। अतः जब उन्होंने समझौते की शर्तों को देखा तो निश्चय ही वे उन्हें पसंद नहीं आईं। उनमें इतना साहस भी नहीं था कि वे इसे ठुकरा सकें। हिन्दुओं द्वारा नापसंद किए जाने और अछूतों की उपेक्षा के बावजूद दोनों पक्षकारों ने पूना समझौते को मान्यता प्रदान की थी और इसे भारत शासन अधिनियम में भी शामिल किया गया था।’’ ख्1,
पूना समझौते के बाद, तीसरे गोल मेज सम्मेलन इंग्लैंड में आयोजित किया गया था। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए 7 नवम्बर, 1932 को भारत से रवाना हुए। गांधी का अनशन और पूना समझौता हर जगह चर्चा का विषय थे। डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के बारे में एक टिप्पणी इस प्रकार है :
‘‘जहाज पर सवार होने के बाद कई महत्वपूर्ण यात्री पूना समझौता और गांधी द्वारा अनशन के बारे में बात कर रहे थे जिसने पूरे विश्व के भारतीयों को हिला दिया था। अनशन ने उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया था। एक यूरोपीय यात्री ने डॉ. अम्बेडकर की ओर इशारा करते हुए अपने मित्र से कहा कि ‘‘यही वही युवा है जो भारतीय इतिहास के नए पन्ने लिख रहा हैं।’’ ख्2,
1.2. लेखा तथा भाषण, खंड 9, पृष्ठ 7-90।कीर, पृष्ठ 220।