खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 188

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मेरे बारे में यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उस समय मैं अनिश्चितता की जितनी बड़ी तथा गंभीर स्थिति में था उस स्थिति में कोई अन्य व्यक्ति नहीं था। यह एक रहस्यमय स्थिति थी। मुझे दो अलग-अलग अनुकल्पों में से एक को चुनना था। समूची मानवता के प्रति ऋणी होने के नाते गाँधी के मृत्यु से बचाने का कर्त्तव्य मेरे समक्ष था। प्रधान मंत्री ने अछूतों को जो राजनीतिक अधिकार दिए थे, उन्हें बचाने की समस्या मेरे सामने थी। मैंने श्री गांधी की जान बचाने के लिए मानवता की आवाज को सुना और मैं श्री गाँधी के समाधान रूप में साम्प्रदायिक अधिनिर्णय में परिवर्तन के लिए सहमत हो गया। इस समझौते को पूना समझौता कहते हैं।’’

श्री गाँधी ने समझौते की शर्तें मान ली थीं और सरकार ने उन्हें भारत शासन अधिनियम में शामिल करके इन्हें लागू भी कर दिया था। पूना समझौते के लिए अलग-अलग प्रतिक्रियाएं मिलीं। अछूत दुखी थे। ऐसा करने के लिए उनके पास कारण थे। लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो इसे नहीं मानते। वे यह कहने से कभी नहीं चूकते कि पूना समझौते ने प्रधान मंत्री के साम्प्रदायिक अधिनिर्णय से भी अधिक सीटें अछूतों को दी हैं। यह सच है कि पूना समझौते ने अछूतों को 148 सीटें दी हैं, जबकि अधिनिर्णय ने उन्हें 78 सीटें दी थीं। लेकिन यह निष्कर्ष निकालना कि पूना समझौते ने उन्हें अधिनिर्णय से भी अधिक दिया है, वास्तव में अधिनिर्णय ने अछूतों को जो दिया था उसकी अनदेखी करना है।’’

‘‘साम्प्रदायिक अधिनिर्णय ने अछूतों को दो फायदे पहुंचाएं थे : (1) सीटों का एक नियत कोटा जिन पर चुनाव अछूतों के पृथक निर्वाचकमंडल ने करना था और जिन्हें अछूत व्यक्तियों द्वारा भरा जाना था; (2) दोहरा मत, एक का प्रयोग पृथक निर्वाचकमंडल के माध्यम से और दूसरे का प्रयोग साधारण निर्वाचकमंडल के माध्यम से किया जाना था।’’

‘‘अब, अगर पूना समझौते ने सीटों का नियत कोटा बढ़ा दिया है तो दोहरे मतदान का हक छीन लिया है। सीटों में इस वृद्धि को दोहरे मतदान की हानि की क्षतिपूर्ति के रूप में कभी भी नहीं देखा जा सकता। साम्प्रदायिक अधिनिर्णय ने जो अतिरिक्त मताधिकार दिया था वह एक अमूल्य विशेषाधिकार था। एक राजनीतिक हथियार के रूप में इसके मूल्य की गणना नहीं की जा सकती। प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र में अछूतों की मतदान क्षमता 1/10 है। सवर्ण हिन्दू उम्मीदवारों के चुनाव में इस मतदान क्षमता का प्रयोग करने के लिए मुक्त अछूत आम चुनाव के मुद्दे के बारे में आदेश देने के तो नहीं, लेकिन इसे तय करने की स्थिति में अवश्य होते। कोई भी सवर्ण हिन्दू उम्मीदवार अपने निर्वाचन-क्षेत्र में अछूत की अनदेखी करने का साहस नहीं कर सकता था या फिर उनके हितों के प्रति उग्र नहीं हो सकता था, बशर्ते कि वह