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“भारत के इतिहास में 1930 का वर्ष क्रिया और प्रतिक्रिया का वर्ष था। यह वर्ष
नए चिंतन और नए दृष्टिकोण, दमन के नए उपाय तथा पुनर्मेल की नई विधियों
की धारा लेकर आया। सही कहें तो यह सत्याग्रह का युग था। यह वही वर्ष था
जब कांग्रेस के सेनापति के रूप में महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को देश की
स्वतंत्रता के लिए इस महान आंदोलन का आग़ाज किया और समूचे देश को सत्याग्रह
की रंगशाला में रूपांतरित कर दिया, जिसमें अपार जनसमूह घुड़सवार पुलिस की
बटालियनों, गोलियों और जेल की जिंदगी का सामना कर रहा था।
महात्मा गांधी की दांडी यात्रा से दस दिन पहले भारतीय सामाजिक अशांति
के पिता अम्बेडकर ने नासिक में मंदिर प्रवेश आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन
की तैयारियाँ तीन महीने से अधिक समय से चल रही थीं। डॉ. अम्बेडकर अपने
पत्रों और सहायकों के जरिए बम्बई से इसका मार्गदर्शन, प्रेरण और आयोजन कर
रहे थे। नासिक में दलित वर्गों ने एक सत्याग्रह समिति बनाई और इसके सचिव
भाउरा व गायकवाड के जरिए प्रसिद्ध कलाराम मंदिर के न्यासियों को सूचित किया
कि यदि नियत तिथि से पहले अस्पृश्य हिन्दुओं के लिए मंदिर के द्वार नहीं खोले गए
तो वे सत्याग्रह शुरू करेंगे। साथ ही उक्त मंदिर में श्री राम की पूजा करने के अपने
अधिकार का आग्रह करने के लिए नासिक में आने के वास्ते दलित वर्गों का आह्वान
किया गया। सत्याग्रह समिति के इस आह्वान के फलस्वरूप नासिक में खासतौर पर
दलितों के इलाको में बनाए गए पंडाल में करीब 15,000 स्वंयसेवक और प्रतिनिधि
एकत्रित हुए। उनमें देवराव नायक, राजभोज, प्रधान, शिवतारकर, पतितपावनदास
और बी.जी. खेर के नाम उल्लेखनीय हैं।
आखिरकार कार्रवाई का दिन आ गया। यह 2 मार्च, 1930 का रविवार था। प्रातः
दस बजे स्थिति पर विचार करने और सत्याग्रह शुरू करने के तरीके और माध्यम
अपनाने के लिए डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के नेतृत्व में पंडाल में सभा हुई। ख्1,
“डॉ. अम्बेडकर ने कलाराम मंदिर में प्रवेश के बारे एकं विचारोत्तेजक भाषण
दिया। उन्हांने कहा, आज हम मंदिर में प्रवेश करने वाले हैं। लेकिन मंदिर में प्रवेश
से सारी समस्या हल नहीं होगी। हमारी समस्या व्यापक है। यह राजनीतिक, सामा
जिक, धार्मिक, आर्थिक, शैक्षिक इत्यादि है। कलाराम मंदिर में प्रवेश का मामला हिन्दू
मस्तिष्क से एक अपील है। ऊंची जाति के हिन्दुओं ने युगों से हमारा दमन किया
है। मंदिर प्रवेश के लिए इस सत्याग्रह से यह प्रश्न उठेगा कि क्या वही हिन्दू हमें
- कीर, पृष्ठ 136।