खण्ड - IV कालाराम मन्दिर प्रवेश सत्याग्रह, नासिक और मन्दिर प्रवेश आन्दोलन - Page 192

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मानवाधिकार प्रदान करेंगे। क्या हिन्दू मस्तिष्क हमें मानव के रूप में स्वीकार करने का इच्छुक है, इस सत्याग्रह के जरिए इसी प्रश्न को परखा जाना है। ऊंची जाति के हिन्दुओं ने हमें हेय दृष्टि से देखा है और हमारे साथ कुत्तों एवं बिल्लियों से भी बुरा बर्ताव किया है। हम यह जानना चाहते हैं वही हिन्दू हमें मानव का दर्जा देंगे अथवा नहीं। यह सत्याग्रह हमें इस सवाल का जवाब उपलब्ध कराएगा। यह सत्याग्रह ऊंची जाति के हिन्दुओं के दिलों में बदलाव लाने का एक प्रयास है। इसलिए इस प्रयास की सफलता हिन्दू नज़रिये पर निर्भर करती है।

राम मंदिर में प्रवेश से हमारी वास्तविक समस्या हल नहीं होने जा रही है। इससे हमारे जीवन में कोई आमूल परिवर्तन नहीं आएगा। लेकिन ये ऊँची जाति के हिन्दुओं के मस्तिष्क को समझने के लिए परीक्षा है। क्या हिन्दू मस्तिष्क नए ज़माने की दात्त महत्वाकांक्षाओं को स्वीकार करने का इच्छुक है कि “मनुष्य के साथ मनुष्य जैसा बर्ताव करना चाहिए, उसे मानवाधिकार प्रदान किए जाने चाहिए, मान प्रतिष्ठा स्थापित की जानी चाहिए” इन सबका अब परीक्षण होने जा रहा है। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमने यह सत्याग्रह शुरू किया है। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या ऊँची जाति के हिन्दू इन पहलुओं पर विचार और तद्नुसार कार्रवाई करेंगे।

हम जानते हैं कि इस मंदिर में पत्थर से बने भगवान की प्रतिष्ठा की गई है। उस पर केवल एक दृष्टि डालने से या उसकी पूजा करने से, हमारी समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। लाखों लोग इस मंदिर में आए होंगे और अब तक भगवान के दर्शन किए होंगे। लेकिन यह कौन कह सकता है कि ऐसा करने से उनकी बुनियादी समस्या हल हो गई? हम यह जानते हैं। लेकिन आज हमारा सत्याग्रह हिन्दुओं के दिलों में बदलाव लाने का एक प्रयास है। इस सैद्धांतिक स्थिति के साथ हम यह सत्याग्रह शुरू कर रहे हैं।’’ ख्1,

’‘दोपहर को सम्मेलन बर्खास्त हो गया और पुनः शुरू हुआ।’’

दोपहर बाद तीन बजे जनसमूह ने खुद को चार चार की टोलियों में विभाजित कर लिया और एक मील से अधिक दूर तक फैले जुलूस में बदल गया। नासिक के इतिहास में यह सबसे बड़ा जुलूस था। सबसे आगे एक बैंड बज रहा था, उसके बाद सैन्य शैली में सैन्य जीवन से जुड़े दलित वर्ग के सदस्य थे। उसके बाद स्काउट बैच था। उनके पीछे करीब 500 महिला सत्याग्रही अपने दृष्टिकोण में क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रदर्शन कर रही थीं और उनके पीछे उत्साह की भावना से प्रफुल्लित भीड़ चल रही थी लेकिन वह भीड़ पूरी अनुशासन भावना, क्रम और निश्चय के साथ

  1. डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर रांची पात्रे (मराठे), शंकरराव खरात, पृष्ठ 46, 47 अंग्रेजी अनुवादक

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