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- पानी के लिए नहीं बल्कि
मानवाधिकारों की स्थापना के लिए
अब आसमान में आत्म-सम्मान का सूर्य निकल आया है और दमन के बादल
छंटने लगे हैं। दलित वर्गों ने हिम्मत दिखानी शुरू कर दी है। अब हम डॉ. बी.
आर. अम्बेडकर के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना पर आते हैं। वह घटना महाड
की ओर कूच करने के बारे में थी। इसकी उत्पत्ति बंबई (अब मुंबई) विधान परिषद
के उस महत्वपूर्ण संकल्प में है जिसे एस.के. बोले ने प्रस्तुत किया था और बंबई
सरकार ने स्वीकृत किया था। बोले संकल्प, जिसे 1923 में पारित किया गया और
जिसकी थोड़े-से परिवर्तन के साथ 1926 में पुनः पुष्टि की गई, के अनुसरण में
महाड नगरपालिका ने चावदार टैंक को अछूतों के लिए खोल दिया था। तथापि
नगरपालिका का संकल्प एक संकेत मात्र रह गया क्योंकि अछूतों ने सवर्ण हिंदुओं
के विरोध के कारण अपने अधिकार का प्रयोग नहीं किया।
अतः, कोलाबा जिला के दलित वर्गों ने तय किया कि महाड में 19 और 20 मार्च,
1927 को एक सम्मेलन किया जाए। सम्मेलन के नेताओं ने डॉ. अम्बेडकर को सम्मेलन
की तिथि की सूचना पूर्व महीने के प्रथम सप्ताह में दे दी थी। सम्मेलन की व्यवस्था
सुरेन्द्रनाथ टिपणिस, सूबेदार सावरकर और अनंतराव चित्रे द्वारा सावधानी से की गई।
पिछले दो महीनों से कार्यकर्त्ताओं और नेताओं ने पास-पड़ोस के सभी स्थानों की पैदल
यात्रा की और दलित वर्गों को सम्मेलन के महत्व के प्रति जगाया। इसके परिणामस्वरूप,
चारों ओर से पन्द्रह वर्ष के बच्चों से लेकर सत्तर वर्ष के वृद्धों ने अपने कंधों पर रोटी
के टुकड़ों वाली पोटलियां लटकाए सौ मील से भी अधिक की दूरी पैदल पार की और
महाड पहुंचे। महाराष्ट्र और गुजरात के लगभग सभी जिलों कें दलित वर्गो के लगभग
दस हजार प्रतिनिधि, कार्यकर्त्ता और नेता सम्मेलन में उपस्थित हुए।
सम्मेलन को सफल बनाने हेतु प्रत्येक सावधानी बरती गई, प्रत्येक सुविधा जुटाई
गई और सभी उपाय किए गए। सवर्ण हिन्दुओं से चालीस रुपए का पानी खरीदा
गया ताकि सम्मेलन की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके, क्योंकि सम्मेलन
स्थल पर दलितों के लिए पानी उपलब्ध नहीं था।
- आत्म बल से अन्याय का प्रतिरोध करना।