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“भीमवराव अम्बेडकर के पिता सूबेदार रामजी मालोनी 2 फरवरी, 1913 को चल बसे। भीमराव अम्बेडकर को अब अपने पैरों पर खड़ा होना था। ज्ञान के लिये उनकी उत्कट प्यास और महत्वाकांक्षा की प्रेरणा ने उन्हें बेचैन कर दिया। अब उनकी बड़ौदा में अपनी नौकरी पर वापस लौटने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी। वहाँ वे कुछ ही समय रहे थे, लेकिन नाखुश रहे थे। अन्ततः जून, 1913 में उन्हें एक और मौका मिला। उस समय बड़ौदा के महाराजा * ने कुछ छात्रों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु अमरीका की कोलम्बिया यूनिवसिर्टी में भेजने का विचार बनाया।’’ ख्1,
“जब महामहिम महाराजा बम्बई में थे, तब बड़ौदा में अपनी सेवा तथा आवासीय सुविधा में झेली गई असुविधाओं से उन्होंने अवगत कराने हेतु भीमराव उनसे मालाबार हिल के महल में मिले। महामहिम महाराज को भीमराव के विषय में लगभग सभी कुछ पहले से ही मालूम था। भीमराव द्वारा झेली गई असुविधाओं के विषय में एक शब्द भी न कहकर महाराजा उनसे अन्य विभिन्न विषयों पर बात करते रहे। मह ामहिम महाराजा द्वारा पूछे गये सभी प्रश्नों पर भीमराव ने अपना दृष्टिकोण बताया। लगभग आधे घंटे की चर्चा के बाद महाराजा ने उन्हें कल उसी समय आने कहा। चूंकि महाराजा ने भीमराव की शिकायतों पर एक शब्द भी नहीं कहा था, इसलिए भीमराव उदास थे।
अगले दिन महामहिम महाराजा ने पूछा कि वे कौन-सा विषय पढ़ना चाहेंगे। भीमराव ने जवाब दिया, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और विशेष रूप से वित्त।
महामहिम महाराजा : ये विषय पढ़कर तुम क्या करोगे?
भीमराव ः इन विषयों के अध्ययन से मुझे अपने समाज की पिछड़ी
हुई स्थिति सुधारने के सुराग मिलेंगे और उन्हीं की
तजऱ् पर मैं सामाजिक सुधार का कार्य करूँगा।
महामहिम महाराजा : (हँसते हुए) लेकिन तुम तो हमें अपनी सेवायें प्रदान
करने वाले हो, है ना? फिर तुम अध्ययन, सेवा और
* ख्., बड़ौदा के महाराजा सायाजीराव गायकवाड़ का जन्म 1 मार्च, 1863 को हुआ था। उनका
राज्याविभेषक 28, दिसम्बर, 1881 को हुआ। महाराजा ने 6 फरवरी, 1939 को बम्बई स्थित अपने
जय महल में अंतिम सांस ली।
- कीर, पृष्ठ 24-26।