18. ऐसे संस्थानों को बड़े पुस्तकालयों के रूप में विकसित होने दें। - Page 264

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इस तरह के संस्थाओं को बड़े पुस्तकालयों में विकसित करें

रजवाड़े संशोधन मंडल, धूलिया (महाराष्ट्र) की आगंतुक पंजी पर 18 जून, 1938 को डॉ बी.आर. अम्बेडकर द्वारा लिखी गई टिप्पणी :- संपादक

“मैंने कोई छः-सात वर्ष यूरोप और अमरीका के विभिन्न पुस्तकालयों में बिताये हैं और रजवाड़े संशोधन मंडल की पाण्डुलिपियों तथा चित्रकारियों के संग्रह को देखकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई है। यूरोपीय पुस्तकालयों की तुलना में वास्तव में यह बहुत छोटी जगह है। परन्तु इसकी जिम्मेदारी उन पर नहीं है, जिन्होंने इस संस्था का सृजन किया है। उम्मीद की जाती है कि नई सरकार इस तरह की संस्थाओं पर पर्याप्त ध्यान देगी और देखेगी कि किस तरह इन्हें बड़े पुस्तकालयों में विकसित किया जा सकता है। मैं इस संस्था की सफलता की कामना करता हूँ।

18-6-1938 ह. /बी.आर. अम्बेडकर