परिशिष्ट-
हरेगांव सम्मेलन में पारित संकल्प
वतनदार महार और मंग, वेठिया तथा अन्य निम्न ग्राम सेवकों का सम्मेलन
प्रांत में हाल में लागू की गई महार इनाम जमीन पर जूड़ी बढ़ाने की नीति का
विरोध करता है। इस नीति के अंतर्गत, जूड़ी में बहुत ज्यादा वृद्धि, पहले से गरीबी
से ग्रस्त वतनदार महारों और मंगों पर लाद दी गई है और सम्मेलन की मांग है
कि उस नीति को तुरंत वापस लिया जाए तथा उसके अनुसार लगाई गई लेवी
रद्द की जाए क्योंकि उक्त नीति हेयरडिटेरी विलेज आफिसेज एक्ट में अंतर्निहित
सिद्धांतों के विपरीत है तथा कठोर और अनुचित भी है।
यह सम्मेलन संकल्प करता है कि सा.नि. सं. 7420/33, रा. वि. तारीख
13 सितम्बर, 1938 में उन कार्यों की सूची दी गई है जो महारों और मंगों द्वारा किए
जाने हैं और यह असह्य बोझ अधिरोपित करता है जिसे सहन करना वतनदारों के
लिए असंभव है। सम्मेलन की राय है कि इन वतनदारों से दैनिक मजदूरी के रूप में
अतिरिक्त पारिश्रमिक दिए बिना, मद सं. 1, 3, 5, 9, 13 और 19 पर सूचीबद्ध कार्य
करने की अपेक्षा न की जाए और जब कभी उनसे इन कार्यों को करने की अपेक्षा
करे तो उन्हें कम से कम आठ आने दिए जाएं।
सम्मेलन की राय है कि इन वतनदारों को ड्यूटी सं. 15 का निर्वहन करने से
छूट दी जाए क्योंकि सम्मेलन की राय में यह काम पुलिस का है।
इस सम्मेलन की राय है कि ड्यूटी सं. 2 गांव वालों को बटकी पुकारने तक
सीमित रहनी चाहिए तथा इसका विस्तार अक्खड़ ग्रामवासी के पीछे-पीछे बार-बार
दौड़ने के लिए नहीं होना चाहिए।
संकल्प सं. 2 :
इस सम्मेलन की राय है कि महार की वतन को उसी सिद्धांत पर संराशीकृत
किया जाए जो 1863 में श्री गोर्डन द्वारा समाज के लिए उपयोगी ग्राम सेवक की