402 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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कोई भी व्यक्ति स्वयं के मामले में न्यायधीश नहीं होना चाहिए
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नई दिल्ली, 10 दिसम्बर, 1951
भारत के पूर्व कानून मंत्री तथा, भारत और संविधान के प्रधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर, आज उच्चतम न्यायालय में एक वकील (प्रैक्टिसिंग लॉयर) के रूप में उपस्थित हुए। वे शीघ्र ही कुछ ज़मींदारों की याचिकाओं पर बहस करेंगे।
श्री पी.आर. दास, जो कि अपनी बहस आज पूरे दिन करते रहे, ने एक स्थान पर डॉ. अम्बेडकर की न्यायालय में उपस्थिति का उल्लेख किया था। उन्होंने न्यायालय को बताया कि संविधान के प्रारूप में एक वाक्यांश था परन्तु डॉ. अम्बेडकर के कहने पर उसे बाद में हटा दिया गया।
श्री दास ने कहा, ‘‘डॉ. अम्बेडकर यहाँ हैं। श्रीमन् कृपया आप उन्हें यह स्पष्ट करने के लिए बुलाएँ कि उन शब्दों को क्यों हटा दिया गया।’’ (ऊँचे स्वर में हँसी)-यू.पी.आई।’’ ख्1,
नई दिल्ली, 6 मार्च *
डॉ. अम्बेडकर ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष उत्तर-प्रदेश के जमीदारों की ओर से अपनी बहस जारी रखते हुए कहा कि जमीदारों को भुगतान की जाने वाली क्षतिपूर्ति की राशि को निश्चित करने के लिए राज्य निर्णय नहीं ले सकता। अमरीकी सिद्धांतों के आधार पर डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि न्यायशास्त्र के अनुसार कोई व्यक्ति स्वयं के मामले में निर्णायक नहीं हो सकता है।
डॉ. अम्बेडकर, कुछ जमीदार याचिकादाताओं की ओर से उत्तर प्रदेश जमीदारों एवं सम्पदा उन्मूलन अधिनियम को चुनौती दे रहे थे।
मुख्य न्यायधीश द्वारा यह प्रश्न पूछे जाने पर कि यदि राज्य क्षतिपूर्ति का निर्धारण नियत करता है तो यह उपचार क्या होना चाहिए, अधिवक्ता ने कहा कि न्यायालय राज्य द्वारा नियत क्षतिपूर्ति को स्वैच्छिक उपाय के रूप में घोषित करे।
- दिनांक 11 दिसम्बर, 1951 का द फ्री प्रेस जर्नल
* दोनों में से एक तारीख गलत मालूम होती है - संपादक।