59. मुझे विश्वास करता है कि मेरे लोग भारत में बुद्धधर्म स्थापित करने के लिए हर चीज का त्याग करेंगे। - Page 462

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‘‘डॉ. बी.आर. अम्बेडकर और श्रीमती अम्बेडकर श्री बी.एच. वराले और डॉ. मावलंकर के साथ नेपाल में 17 नवम्बर, 1956 को होने वाले विश्व बौद्ध सम्मेलन में भाग लेने के लिए रवाना हुए थे।

नेपाल के लिए 13 नवम्बर, 1956 को प्रस्थान करते समय श्री वाई.सी. शंक­ रानन्द शास्त्री ने हवाई अड्डा, नई दिल्ली पर बड़ी विनम्रता से पूछा, ‘‘बाबा साहिब, आपके गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए आपके द्वारा धम्म के प्रचार के लिए भारत भ्रमण कितना सम्भव होगा?’’ बाबा साहिब, ने थोड़ा क्रोधित होते हुए परन्तु दृढ़ता से कहा कि बौद्ध धर्म के प्रचार जैसे कार्य के लिए मैं बिल्कुल भी बीमार नहीं हूँ। मैं अपने शेष जीवन का हर क्षण भारत में बुद्ध के धम्म के पुनरूद्धार और प्रचार के महान कार्य में लगाने को तैयार हूँ।

‘‘मैं दिसम्बर मास में बम्बई में लाखों लोगों को ‘‘दीक्षा’’ देने जा रहा हूँ। नागपुर में दिनांक 14 अक्तूबर, 1956 को हुए महान पुनरूद्धार सम्मेलन की तरह बम्बई में भी इसी तरह का सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। जिसमें लाखों लोग बौद्ध धर्म में परिवर्तित किए जाएँगे। नागपुर की तरह धर्म परिवर्तन की सभा भारत के अन्य शहरों में भी आयोजित की जाएँगी।’’

‘‘न केवल अस्पृश्नीय समझे जाने वाले लोग बल्कि सभी लोग बिना किसी जाति या धर्म के भेद-भाव के, जो बुद्ध की शिक्षा में विश्वास रखते हैं, इस दीक्षा समारोह में भाग लें तथा बौद्ध धर्म धारण करें।’’

वहाँ उपस्थित जन-समुदाय के साथ वार्तालाप करते हुए बाबासाहब अम्बेडकर ने दृढ़तापूर्वक कहा, ‘‘यह विश्वास करना बिलकुल गलत है कि बुद्ध विष्णु का अवतार है। यह एक गलत और शरारतपूर्ण प्रचार है।’’ इस दुष्टतापूर्ण सिद्धांत का प्रचार करने वाले लोग ब्राह्मणवाद के अनुयायियों के अलावा और कोई नहीं है। उनका उद्देश्य असमानता और आपसी घृणा पर आधारित भेदभाव को बनाए रखना है ताकि समाज पर उनका प्रभुत्व बना रहे। मैंने अपने पूरे जीवनकाल में जाति एवं पारस्परिक घृणा पर आधारित विभाजन की बुरी प्रथा को समाप्त करने के लिए संघर्ष किया है। वास्तव में मैं अपने आप को भारत में बौद्ध धर्म के पुनरूद्धार के कार्य को विलम्ब से