परिशिष्ट-1
हिंसक ताकत से अस्पृश्यता को बनाए नहीं रखा जा सकता है।
| &e | gkRek |
|---|
यह वह लेख है जो महाद सत्याग्रह के सम्बन्ध में यंग इंडिया में प्रकाशित हुआ
था।
‘‘अस्पृश्यता और अविवेक’’
महाद से एक सम्वाददाता ने लिखाः
मुझे आपको यह बताते हुए अत्यंत दुख हो रहा है कि पिछली मार्च की 20 तारीख को स्पृस्यों और अस्पृश्यों के मध्य दंगा हुआ था। गत मार्च की 19 और 20 तारीख को कोलाबा जिले में दलित वर्गों का एक सम्मेलन हुआ था। सभा सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। जब भीड़ छटने लगी तो बम्बई की समाज सेवा लीग के श्री ए.वी. चित्रे ने लोगों को कहा कि चूँकि वे प्यासे थे और सूर्य की गर्मी बहुत थी, वे सार्वजनिक टैंक के पास जाकर पानी पी सकते हैं। यहाँ पर कुछ ऐसे लोग भी थे जो लोगों को टैंक के पास जाने से रोकने का प्रयास कर रहे थे। परन्तु अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर ने निर्णय लिया कि लोगों को टैंक तक ले जाएँ। पुलिस निरीक्षक भी स्थिति की गम्भीरता को नहीं समझ सके और भीड़ को रोकने के बजाए उनके साथ टैंक की ओर चल पड़े। टैंक ब्राह्मण कॉलोनी के मध्य में स्थित है लेकिन किसी को कोई जानकारी नहीं थी कि अस्पृश्य टैंक की ओर जा रहे हैं। वहाँ कोई गड़बड़ी नहीं थी और उनमें से सैंकड़ों लोगों ने ‘‘हर-हर महादेव’’ का नारा लगाकर टैंक से पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई। इसी दौरान मौके पर स्पृश्य आ गए और उन्होंने यह पूरी घटना रोषपूर्ण भाव से देखी। अस्पृश्यों की भीड़ तब पंडाल में अपने भोजन के लिए वापस चली गई। इसके एक घंटे के अन्दर महाद के नागरिक अचानक गुरावा के तेज नारे से जाग उठे और उन्हें बताया गया कि अस्पृश्य विरेश्वर के मंदिर में घुसने की सोच रहे थे।