परिशिष्ट - I : क्रूर बल अस्पृश्यता को स्थिर नहीं रख पाएगा। - Page 466

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यह एक झूठा नारा था; परन्तु कुछ ही समय में मंदिर स्पृश्यों की क्रुद्ध भीड़ से भर गया और इनके हाथों में लाठियाँ थीं। बेचारे अस्पृश्यों की मंदिर में जाने की कोई मंशा नहीं थी। परन्तु स्पृश्यों ने किसी अस्पृश्य को मन्दिर में प्रवेश करने का प्रयास करते नहीं पाया तो वे उन्मादित होकर दौड़कर बाज़ार में चले गये और गली में कोई भी अस्पृश्य मिला तो उसे पीटना शुरू कर दिया। जब स्पृश्यों द्वारा इस प्रकार मारपीट की जा रही थी तो किसी अस्पृश्य ने किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं किया। कुछ स्पृश्य जो अस्पृश्यों के प्रति सहानुभूति रखते थे, ने उनकी रक्षा करने की कोशिश की परन्तु उत्तेजित भीड़ को रोका नहीं जा सका। वे जूता-साजों और अन्यों की झुग्गियों में घुस गये तथा उन्हें बुरी तरह से पीटा। अस्पृश्यता तेजी से सहायता के लिए भागे परन्तु दुकानदारों द्वारा कोई सहायता नहीं की गई। अस्पृश्य जो पंडाल में थे, उनका स्पृश्यों द्वारा उपहास किया गया कि वे संघर्ष के लिए आगे नहीं आये। पंडाल में लगभग 1500 स्पृश्य थे और यदि उन्होंने लड़ाई के लिए ललकारा होता तो बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाता तथा हिन्दुत्व अपमानित हो जाता। डॉ. अम्बेडकर ने अपने परामर्श को उचित ठहराते हुए कहा कि मैंने बम्बई विधानपरिषद् में पारित संकल्प के आधार पर तथा महाद नगरपालिका द्वारा व्यक्त उस राय कि अस्पृश्य कानूनी रूप से सार्वजनिक टैंकों एवं कुंओं से पानी लेने के हकदार हैं, के आधार पर परामर्श दिया था।

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महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह तथा हिन्दू समाज में अस्पृश्नीयता की समस्या पर

अपने विचार व्यक्त किये, जो इस प्रकार हैः

मैंने संवाददाता के पत्र से और अधिक विस्तृत विवरण वाले अंशों को हटा दिया है। परन्तु मुझे पत्र वास्तविक प्रतीत हुआ है और किसी भी रूप से अतिश्योक्तिपूर्ण प्रतीत नहीं होता है। तब यह अनुमान लगाते हुए कि घटना का विवरण सही रूप से लिखा गया है तो कथित उच्च वर्गों की ओर से अकारण निरंकुशता के संबंध में कोई प्रश्न हो ही नहीं सकता। इसके लिए यह याद रखना चाहिए कि टैंक से पानी पीने की घटना नहीं बल्कि इस गलत सूचना कि अस्पृश्य मन्दिर में प्रवेश करना चाहते हैं, के कारण स्पृश्य मन्दिर में इक्ट्ठा हुए थे। परन्तु यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि विवेकशीलता और अतिर्कसंगतता एक साथ कार्य करे। अस्पृश्यनीयता का अपने-आप में कोई औचित्य नहीं है। यह एक अमानवीय प्रथा है। यह प्रथा अब लड़खड़ा रही है और इसे एक कथित रूढि़वादी पार्टी द्वारा केवल हिंसक ताकत की सहायता से बनाए रखने की चेष्टा की जा रही है।

कथित अस्पृश्यों ने अत्यन्त उत्तेजक परिस्थितियों में अपने अनुकरणीय आत्म-संयम द्वारा प्रश्न को हल के एक कदम नज़दीक ला दिया है। यदि वे प्रतिरोध करते तो