468 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री आचार्य ने श्री गाँधी को चुनौती दी है कि श्री गांधी अपने निजी मन्दिर क्यों नहीं बनवा कर देखते कि अस्पृश्य सहित सभी हिन्दू उनमें जाकर पूजा कर सकें?’’ कोई नहीं कह सकता कि श्री गांधी में नैतिक साहस की कमी है। परन्तु वे श्री आचार्य की चुनौती को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि महात्मा एक चतुर राजनी तिज्ञ हैं। और यह एक राजनैतिक कौशल का प्रश्न है और न कि पूर्णतया धार्मिक प्रश्न है। श्री आचार्य भूल गये हैं कि महात्मा हमें प्रायः बताते है, ‘‘अधिकतर धार्मिक व्यक्ति जिनसे मैं मिला हूँ असल में राजनीतिज्ञ हैं। लेकिन मैं, जिसने राजनीतिज्ञ का चोला पहना हुआ है, दिल से एक धार्मिक व्यक्ति हूँ। मेरा धर्म मेरी राजनीति हैं (आत्मकथा) उन्होंने हमेशा धर्म एवं सिद्धान्त को नीति एवं राजनीति के अधीन माना है। उन्होंने अपने देश को सामान्य रूप से और विशेष रूप से हिन्दुत्व को जो जख्म दिये हैं उनका वर्णन करना असंभव है। पूना समझौता को देखें, जिसपर जल्दबाजी में हस्ताक्षर किये गये, अब पूरे देश में यह अनुभव किया जा रहा है कि यह हिन्दू जाति के प्रति घोर अन्याय है। श्री गांधी ने देश को अनुचित समझौते में धकेल दिया है। अब वह पुनः प्रयास कर रहे हैं कि देश को हरिजनों के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया जाए जब कि हरिजन वास्तव में ऐसा नहीं चाहते हैं। ख्1,
- स्रोत सामग्री, खण्ड 1, पृष्ठ 107-108।