61
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका
और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में
‘‘वर्ष 1919 के भारत शासन अधिनियम में एक प्रावधान था, जिसके अनुसार
संविधान के कार्यकरण की जांच करने और जैसा आवश्यक पाया जाए ऐसे परिवर्तन
पर रिपोर्ट करने के लिए दस वर्षों के अंत में एक रायल कमीशन नियुक्त करने के
लिए महामहिम सम्राट की सरकार पर दायित्व सौंपा गया था। तदनुसार, वर्ष 1928 में
सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक रायल कमीशन नियुक्त किया गया। भारतीयों
की आशा थी कि वह कमीशन एक मिश्रित कमीशन होगा। परंतु लॉर्ड बर्केनहेड,
जो भारत के लिए तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थे, भारतीयों को शामिल करने के
विरुद्ध थे और उन्होंने इसे विशुद्ध संसदीय कमीशन बनाने पर जोर दिया। इस पर
कांग्रेस और उदारवादियों ने अत्यधिक, प्रतिरोध प्रकट किया और इसे अपमान माना।
उन्होंने कमीशन का बॉयकाट किया और उसके विरुद्ध आंदोलन किया। विरोध की
इस भावना को शांत करने के लिए महामहिम सम्राट की सरकार द्वारा घोषणा की
गई कि कमीशन का कार्य पूरा हो जाने के बाद नए भारत के नए संविधान के विषय
में काम करने से पूर्व प्रतिनिधि भारतीयों को चर्चा के लिए बुलाया जाए। इस घोषणा
के अनुसार प्रतिनिधि भारतीय को संसद के प्रतिनिधियों और महामहिम सम्राट की
सरकार के साथ गोल मेज सम्मेलन में लंदन बुलाया गया।’’ ख्1,
‘‘भारत में अशांत स्थिति को शांत करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1919 के
अधिनियम की पुनः जांच करने और उसे संशोधित करने का निर्णय लिया। इसलिए
उसने साइमन कमीशन के अध्यक्ष सर जॉन साइमन के नाम से बेहतर ज्ञात साइमन
कमीशन के रूप में भारतीय सांविधिक आयोग की नियुक्ति की घोषणा की। इस
आयोग में सर जॉन साइमन, जो एक महान सांसद थे, के अधीन कार्य करने के
लिए दो समकक्ष व्यक्ति और चार आम व्यक्ति शामिल थे तथा यह निर्णय लिया
- लेख और भाषण, खंड-9, पृष्ठ 40 ।