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आगे दिए गए पृष्ठों में मैंने संविधान के अनुच्छेदों का पाठ नहीं दिया है। मेरे विचार से, ऐसा करना उन विद्यार्थियों के लिए अनुपयोगी होता जो संविधान के प्रावधानों और इसमें अंतर्निहित सिद्धांतों का समग्र विवेचन देखना चाहते हैं। इसके बजाए मैंने कुछ शीर्षकों को चुनकर विचार-विमर्श एवं विवेचन के प्रयोजनार्थ संविधान में से इन शीर्षकों से सुसंगत अनुच्छेद एकत्रित किए हैं। ये शीर्षक कौन-कौन से हैं यह विषय सूची तालिका देखने से स्पष्ट हो जाएगा। यह संविधान का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन है जिसका उद्देश्य संविधान का एक वस्तुनिष्ठ चित्र प्रस्तुत करना और तुलनात्मक रूप से अन्य देशों के संविधानों के प्रावधानों को देखना है।
यह असंभव नहीं है कि पाठक यह पूछे कि मैंने विचार-विमर्श हेतु शीर्षकों का चयन किस आधार पर किया है। मेरा उत्तर यह है कि ये वे विषय हैं जो सामान्यतः संवैधानिक कानून के दायरे के भीतर आते हैं। लेकिन इस उत्तर से दूसरे कई प्रश्न उठते हैं। संविधान से क्या तात्पर्य है? संवैधानिक कानून का स्वरूप और दायरा क्या है? अतः इस विषय पर कुछ स्पष्टीकरण देना बहुत जरूरी है। लेकिन यह अत्यंत संक्षिप्त होना चाहिए।
संविधान शब्द से क्या तात्पर्य है? कानूनी अर्थ में संविधान शब्द से कोई विनियम बनाना अथवा इस प्रकार बनाए गए विनियम के संबंध में अध्यादेश देना अभिप्रेत है। प्रोफेसर मॅक्ट्वेन के अनुसार :-
“रोमन साम्राज्य में यह शब्द लैटिन भाषा में सम्राट द्वारा कोई कानून बनाए जाने की क्रिया का तकनीकी शब्द बन गया था, और फिर चर्च ने रोमन विधि से यह शब्द लेकर पूरे चर्च के लिए अथवा किसी विशेष धर्म प्रांत के गिरजे संबंधी विनियमों के लिए लागू कर दिया। चर्च से अथवा संभवतः रोमन कानूनी पुस्तकों से ही यह शब्द उत्तर मध्य काल में फिर प्रयुक्त होने लगा और उस समय के धर्म निरपेक्ष अधिनियमों के लिए प्रयुक्त होने लगा।”
शताब्दियों से संविधान शब्द किसी विशेष प्रशासनिक अधिनियमन का बोध कराता रहा है। रोमन वकीलों के लिए इसका यही अर्थ था। ऐसे विशेष अधिनियमन का