परिच्छेद-IV संस्थाएं, संगठन और उनके संविधान - Page 132

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केबिनेट मिशन और सŸा का हस्तांतरण
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‘‘इंडियन नेशनल आर्मी के विद्रोह और उनके विरुद्ध मुकदमों से उत्पन्न देशभक्ति की लहर, शाही भारतीय नौसेना के नाविकों और शाही भारतीय वायु सेना द्वारा किए गए विद्रोह से शाही तंत्र का विघटन होना प्रतीत है। यह एक स्पष्ट संकेत था कि भारतीय सेना स्वतंत्रता की टीस महसूस और अनुभव कर रही थी। राजनीतिक और राष्ट्रीयता की भावनाएं अपने चरम पर थीं और उनके हृदयों को अपनी ओर खींच रही थीं। अंग्रेज जानते थे कि अब अधिक समय तक भारत को बंधनों में जकड़े रखना संभव नहीं था। अतः 15 मार्च, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत अथवा उसके बिना भी भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार किया और माना कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की प्रगति की कीमत पर अपनी वीटो का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपने तीन केबिनेट मंत्रियों का एक प्रतिनिधि मंडल भेजा, जिसमें सर स्टेफॉर्ड क्रिप्स, ए.वी. एलेक्जेंडर और तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया लॉर्ड पैथिक लॉरेंस, शामिल थे। इन्हें राजनीतिक गतिरोध समाप्त करने के लिए भारतीय दलों के नेताओं से ऑन द स्पॉट वार्ता करनी थी। ब्रिटिश केबिनेट प्रतिनिधि मंडल * 24 मार्च, 1946 को नई दिल्ली पहुंचा।’’

‘‘केबिनेट मिशन के समक्ष ज्ञापन प्रस्तुत करने और अनुसूचित जाति के मामले को पूरी शक्ति और दूरदर्शिता से उठाने के लिए अनुसूचित जाति संघ ने डॉ.अम्बेडकर को प्राधिकृत किया था। उन्होंने दलित वर्गों के उम्मीदवारों को अलग निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से चुने जाने के लिए संविधान में उपबंध किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया और केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान मंडलों लोक सेवाओ और संघ के साथ-साथ प्रांतीय लोक सेवा आयोगों में उनके पर्याप्त प्रतिनिधित्व की मांग की। डॉ. अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की शिक्षा के लिए राशि आबंटित किए जाने का भी आग्रह किया और उनके लिए नई बस्तियां बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

केबिनेट मिशन ने भारतीय गतिरोध को अंतिम रुप से निपटाने के लिए राजकीय

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