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गई है कि हिज मेजेस्टी की सरकार यह मानती है कि अनुसूचित जातियां भारत के राष्ट्रीय जीवन का एक अलग तत्व हैं और हिज मेजेस्टी की सरकार ऐसा कोई संविधान लागू नहीं करेगी, जिसके लिए अनुसूचित जातियां इच्छुक नहीं होंगी। यह प्रश्न पूछा जाता है कि केबिनेट मिशन ने मुस्लिमों और सिक्खों को अलग तत्व क्यों माना और अनुसूचित जातियों को समान स्थिति में रखने के लिए उसने क्यों मना कर दिया?
केबिनेट मिशन के प्रस्तावों पर 18 जुलाई, 1946 को संसद में हुई बहस में सर स्टेफॉर्ड क्रिप्स, श्री अलेक्जेंडर और लॉर्ड पैथिक-लॉरेन्स ने अपने आपको इस आलोचना से बचाने का प्रयास किया। बहस के दो मुद्दे थेः-
(1) कि, फरवरी के अंत में संपन्न प्रांतीय विधान सभा चुनावों में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा कर लिया, जिससे यह प्रतीत होता है कि अनुसूचित जातियां कांग्रेस के साथ थीं और वे कांग्रेस अर्थात् हिन्दुओं को ही अपना भाग्य मानने लगी थीं और यह भी कि उन्हें अलग करने का कोई आधार नहीं था।
(2) कि, अल्पसंख्यकों के लिए एक सलाहकार समिति होनी चाहिए, जिसमें अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व होगा और वे अपने लिए आवश्यक रक्षोपाय तैयार करने के लिए आवाज उठा सकेंगे।
दूसरी प्रतिरक्षा अनुपायोगी से भी बेकार थी। कारण स्पष्ट हैं। सलाहकार समिति की प्रास्थिति और शक्तियों को पारिभाषित नहीं किया गया है। अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व की निर्धारित संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है। सलाहकार समिति के निर्णय लागू करने का अधिकार बहुमत को है। और समिति संविधान सभा की छवि मात्र के अलावा और कुछ नहीं हो सकती। संविधान सभा में अनुसूचित जाति से संबंधित सभी प्रतिनिधि कांग्रेस दल के हैं और वे अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। अतः, वे कांग्रेस दल के आदेश पर निर्भर हैं। उनमें से जिन्हें सलाहकार समिति में लिया जाएगा, वे भी दल के आदेश पर निर्भर होंगे। वे अनुसूचित जातियों के वास्तविक विचारों को न तो संविधान सभा में और न ही सलाहकार समिति में रख सकेंगे।
केबिनेट मिशन के सदस्यों द्वारा अनुसूचित जातियों को पृथक और स्वतंत्र प्रतिनिधित्व देने में विफलता के औचित्य के लिए इस मुद्दे को मुख्य रुप से इस्तेमाल किया गया कि पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति की सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। तो भी उनके बचाव में यह बात काफी नहीं है। यह सत्य है कि अंतिम चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जाति की सीटों पर कब्जा किया था। किन्तु उŸार यह है कि इस चुनाव के परिणाम विभिन्न कारणों की परीक्षा के तौर पर लिए जाने चाहिए।