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डॉ. अम्बेडकर का मध्यमार्ग
इस विषय पर टाइम्स ऑफ इण्डिया में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का वक्तव्य इस
प्रकार बताया गया है :-
पं. मदनमोहन मालवीय और जिन्ना के बीच विचारों व शुभकामनाओं के आदान-प्रदान
से एक बार फिर पता चलता है कि हिन्दुओं और मुसलमानों की परस्पर सहमति से
अंग्रेज सरकार के सांप्रदायिक निर्णय को बदलने की कोई उम्मीद निकट भविष्य में
दिखाई नहीं देती। पं. मालवीय ने यह कहते हुए मैदान छोड़ दिया है कि फिलहाल
तो दोनां समुदायों को अलग-अलग रहते हुए काम करना चाहिए और मैं नहीं जानता
कि कितने लोग दोनों समुदायों के अलग-अलग काम करने की संभावना को सहजता
से स्वीकार करेंगे। जो कुछ हो, परन्तु मुझे तो ऐसा लगता है कि अलग रहकर काम
करने की परिणति अंततः एक-दूसरे के विरोध में काम करने में होकर रहेगी।
मैं न तो हिन्दू हूँ और न ही मुसलमान, और यह पेशकश मैं किसी का पक्ष लेते
हुए नहीं बल्कि समस्या को समझने में लगे एक विधार्थी के रूप में कर रहा हूँ।
इससे पहले कि मैं अपना प्रस्ताव विस्तार से बताऊँ, मेरा यह सुविचारित मत है
कि साम्प्रदायिक विवाद में “अल्पसंख्यक“ शब्द का प्रयोग बड़े ही हल्के-फुल्के ढंग से
किया गया है और बदतर बात तो यह है कि इसका प्रयोग किसी प्रांत अथवा प्रांत
के किसी निर्वाचित क्षेत्र के संदर्भ के बिना ही कर दिया जाता है, जबकि राजनीति
में तो उसके संदर्भ में ही यह कोई अर्थ रखता है। मेरे विचार से कोई समुदाय तभी
अल्पसंख्यक होता है और “अल्पसंख्यक“ के रूप में संरक्षण की पात्रता रखता है, यदि
वह उस प्रांत में अल्प संख्या में है अथवा यदि कानून की दृष्टि से कहें तो निर्वाचन
क्षेत्र में वह “अल्पसंख्यक“ है। प्रांत अथवा निर्वाचन क्षेत्र को छोड़कर “अल्पसंख्यक“
का कोई राजनीतिक महत्व नहीं है।