8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय सुझाव
इस आधारभूत बात से शुरू करते हुए, जिस पर मैं पूरा जोर देना चाहता, हूँ मेरा प्रस्ताव साम्प्रदायिक निर्णय में शामिल दोनों प्रश्नों को अलग-अलग करके देखने का है अर्थात सीटों का प्रश्न और निर्वाचन क्षेत्रों का प्रश्न। ये दोनों प्रश्न अलग-अलग प्रश्न है और इन्हें हल करने के लिए जिन-जिन बातों पर विचार करना चाहिए वे भी सर्वथा भिन्न हैं। दोनों प्रश्नों को अलग-अलग करते हुए हिन्दुओं और मुसलमानों को मेरी सलाह है कि वह साम्प्रदायिक निर्णय के उस भाग को स्वीकार कर लें जो सीटों की संख्या से संबंधित है। इसे चाहें तो स्थायी तौर पर नहीं, बल्कि फिलहाल स्वीकार कर लें और इसका निर्णय भविष्य में कभी, किसी और अधिक समानता के सिद्धांत पर छोड़ दें। लेकिन जहाँ तक निर्वाचन क्षेत्रों का प्रश्न है, हिन्दुओं और मुसलमानों की सहमति से इस एक आसान से प्रस्ताव के साथ साम्प्रदायिक निर्णय में संशोधन किया जाए कि निर्वाचन क्षेत्रों का प्रश्न किसी प्रांत में अथवा प्रांत में किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र में सही मायनों में अल्पसंख्यकों का मामला है, चुनाव चाहे केन्द्रीय या प्रांतीय विधानमण्डल का हो, बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के निर्णय का पालन करना चाहिए।
अल्पसंख्यक निर्णय करें
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यदि अल्पसंख्यक अलग निर्वाचन क्षेत्र चाहते हों, तो बहुसंख्यकों को इसके विरुद्ध कुछ भी नहीं कहना चाहिए; इसी प्रकार यदि अल्पसंख्यक संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र चाहते हों, तो बहुसंख्यकों को उनका निर्णय स्वीकार करने के लिए बाध्य होना चाहिए।
यह प्रस्ताव उन मामलों में भी लागू किया जा सकता है जहाँ अनेक अल्पसंख्यक हैं और जहां निर्वाचन क्षेत्रों के मुद्दे पर उनके विचार एक नहीं हैं। ऐसे मामलों में जहां अल्पसंख्यक अलग निर्वाचन क्षेत्र चाहते है वहाँ उनके लिए अलग नामावली होगी, जबकि संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र चाहने वाले अल्पसंख्यकों की बहुसंख्यकों के साथ सामान्य नामावली होगी। इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता कि इस करार में यह सिद्धांत स्वीकार कर लिया जाए कि निर्वाचन क्षेत्रों के मामले में निर्णय प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के अल्पसंख्यकों पर निर्भर होगा। परन्तु यदि ऐसा नहीं किया जा सकता तो यह भी कुछ बेहतर होगा कि इस आधार पर कोई समझौता ही हो जाए कि निर्वाचन क्षेत्रों का निर्णय उस प्रांत के अल्पसंख्यकों पर छोड़ दिया जाए।
ऐसा समझौता कर लेने से बम्बई, मद्रास, केन्द्रीय प्रांत, संयुक्त प्रांत आदि जैसे हिन्दू बहुलता वाले प्रांतों में मुसलमान अल्पसंख्यकों को यदि वे चाहें तो अलग निर्वाचन क्षेत्र मिल जाएंगे। दूसरी ओर, पंजाब, सिंध, बंगाल उŸार-पश्चिम सीमा प्रांत जैसे