332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह घोषणा की थी कि नारी भी पुरुष की भांति साधुता को प्राप्त कर सकती है।
प्रारंभिक बौद्ध धर्म की इस अभिवृŸा की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि बुद्ध ने एक अवसर पर राजाओं के निमंत्रण को ठुकरा दिया था चूंकि वे पहले ही एक गणिका का निमंत्रण स्वीकार कर चुके थे। राजा इस बात पर हैरान थे कि आम्रपाली जैसी तुच्छ नारी बुद्ध द्वारा सम्मानित की जाए और इसके लिए उन्होंने बुद्ध को ऐसा करने के लिए मना भी किया। लेकिन बुद्ध अपनी बात पर अड़े रहे और आम्रपाली उनकी अत्यधिक प्रशंसनीय नारी और शिष्या बन गई। यदि उनके मन में नारी के प्रति पूर्वाग्रह होता तो वे उसे यहां प्रदर्शित कर सकते थे।
‘‘कि बुद्ध ने हमेशा ही यह उपदेश दिया कि नारियों से सावधान रहो’’, यह अर्धसत्यों में से एक है जिसने उन लोगों को गुमराह किया है जिन्होंने बुद्ध के पाठों का ठीक से परायण नहीं किया है।
हम मामले में बुद्ध ने पुरुषों को प्रोत्साहित नहीं किया है बल्कि उन भिक्षुओं को किया है जिन्होंने प्राचीन भारतीय संन्यासी नियमों के अनुसार ब्रह्मचर्य का व्रत लिया था जिसे बौद्ध और हिंदू दोनों स्वीकारते हैं। भिक्षुणियों को भी पुरुषों से सचेत रहने के लिए प्रेरित किया गया था इस प्रकार बुद्ध का आह्वान नारियों के विरुद्ध पूर्वाग्रह के कारण न होकर पुरुषों और नारियों दोनों में मानव कमजोरी की जानकारी के कारण था।
भारत में बौद्ध नारियां प्रथम थीं जिन्होंने धार्मिक साहित्य में पर्याप्त और स्वतंत्र योगदान किया और जो उस समय के श्रेष्ठ लेखकों के बराबर स्वीकार की गई थीं। यह इस तथ्य से ज्ञात होता है कि बौद्ध भगिनियों के गीतों (थेरीगाथा शीर्षक के अंतर्गत) को प्रामाणिक धर्म-ग्रंथ संग्रहों में सम्मानित स्थान दिया गया और इस प्रकार उन्हें बुद्ध और उनके अत्यधिक प्रमुख शिष्यों के कथनों के पार्श्व में रखा गया था।
हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म दोनों ने ही महान नारियां प्रस्तुत की हैं और हमें पूर्व के रिवाजों और शिक्षाओं तथा मनीषियों के दोष निकालने के बजाय, जिन्होंने उन्हें अपनी आवश्यकताओं और समय और उनके श्रोताओं की समझ की क्षमता के अनुसार उद्घोषित किया उसे ध्यान में रखकर हमें भारतीय नारियों के बीच उन आत्माओं का अनुकरण करने का प्रयास करना चाहिए जो बहुत से शक्तिशाली साम्राज्यों के सामने आज तक टिके रहे, जिनकी समझ शासनकला से भी ऊंची थी और जिनका साहस