331
बौद्ध इतिहास में आद्योपांत बौद्ध समाज का एक विशेष लक्षण यह रहा है कि नारी की स्थिति गैर-बौद्ध देशों की तुलना में अत्यधिक प्रशंसात्मक रही है। प्रारंभ से ही पुरुष और नारी की मूलभूत समता बौद्ध समाज की पथ-प्रदर्शक रही है।
बौद्ध देशों में रह चुका कोई भी व्यक्ति, चाहे वह सीलोन, बर्मा, स्याम, भारत-चीन, तिब्बत हो, जानता है कि वहां नारी की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से ऊंची है क्योंकि बौद्ध पत्नी अपने पति को भगवान नहीं मानती, उससे यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह पति को भोजन करने के पश्चात् भोजन करेगी या पति की मृत्यु के पश्चात् अत्यंत उदासी और तंगी के जीवन के विकल्प के रूप में अपनी आहुति दे देगी। इसके विपरीत, यदि उसे लगता हैं कि वह अपने पति के साथ नहीं रह सकती तो वह उसे छोड़ने के लिए स्वतंत्र है और वह अपने पति की मृत्यु के पश्चात् सामाजिक जाति-बहिष्कृत नहीं होती वरन यदि वह चाहे तो पुनर्विवाह कर सकती है। स्त्रियों के अपने कार्य हो सकते हैं, वास्तव में बर्मा के साथ-साथ तिब्बत (इन देशों के संबंध में मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं) में स्त्रियां पूर्ण रुप से पुरूषों के समान हैं सामाजिक रूप से और व्यवसायों के संबंध में और वे प्रायः पुरुषों की अपेक्षा अधिक उद्यम और योग्यता प्रदर्शित करती हैं इसीलिए पुरुष खुशी से इन कार्यों को अपनी स्त्रियों पर छोड़ देते हैं।
बौद्ध समाज में नारी की ऐसी स्थिति होना संभव ही नहीं होता यदि जैसा समीक्षाधीन लेख के लेखक ने दावे के साथ कहा है, ‘‘बौद्ध को नारियों के प्रति पूर्वाग्रह था और पुरुषों को नारियों से सावधान रहने के लिए हमेशा ही उपदेश देते रहे’’।
बुद्ध जो निश्चित रूप से पहले के समस्त महान् शिक्षकों में से अत्यधिक उदार और सहनशील थे और जो इस कारण भारत के अन्य सपूतों की अपेक्षा भारत की सीमाओं से परे अधिक आदर की दृष्टि से देखे जाते थे और अभी भी देखे जाते हैं। उन पर ऊंगली उठाना कि वे पूर्वाग्राही थे अवश्य ही असाधारण गलत समझी की करतूत है। यदि भारत के समस्त महान मनीषियों में से बौद्ध का ही विश्वव्यापी प्रभाव था तो इसका कारण था किसी प्रकार के पूर्वाग्रह का उनमें पूर्ण अभाव (अन्यथा वे कैसे प्रबुद्ध के रूप में स्वागत-योग्य और मान्य माने जा सकते थे), उनके दृष्टिकोण की सार्वभौमिकता और जाति, रंग या लिंग-निरपेक्ष मानव प्रकृति की उनकी समझ।
वास्तव में उन्होंने ही नारी की मुक्ति (जो मनु के नियमों के अधीन अत्यधिक प्रतिकूल स्थिति में थी) की नींव डाली जैसाकि हमारे विद्वावान लेखक ने स्वीकारा है और इस प्रकार उसने अपनी ही पहले की उक्ति का खंडन किया है कि बौद्ध ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने नारी को पृष्ठभूमि में धकेला है। बुद्ध ही ने सुस्पष्ट शब्दों में