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सांविधानिक विधि के अंतर्गत जब देश डोमिनियन हो जाता है केवल तब ही वह क्राउन को सलाह देने के अधिकार का दावा कर सकता है, और यह तथ्य कि डोमिनियन बनने से पूर्व, क्राउन को भिन्न रुप में सलाह दी गई थी, इसके दावे के लिए कोई बाधा नहीं है। 1935 के अधिनियम के अधीन भारत को उŸारदायी सरकार प्रदान नहीं की गई थी।
अभी उनके वक्तव्य के अन्य भाग पर विचार करना शेष है जिसमें उन्होंने कहा है कि क्राउन भारतीय सरकार को परमोच्च शक्ति अंतरित नहीं करेगा। केबिनेट मिशन के अनुसार परमोच्च शक्ति जापगत हो जाएगी। यह अत्यधिक विस्मयकारी वक्तव्य है और यह दूसरे सुस्थापित सांविधानिक विधि के नियम के विपरीत है। इस नियम के अनुसार राजा अपने परमाधिकारों को अभ्यर्पित या परित्यक्त नहीं कर सकता। यदि क्राउन परमोच्च षक्ति को अंतरित नहीं कर सकता तो क्राउन उसका परित्याग भी नहीं कर सकता....
एक प्रश्न पूछा जा सकता हैः क्या होगा जब भारत स्वतंत्र होगा? क्राउन लुप्त हो जाएगा और क्राउन को सलाह देने का प्रश्न भी नहीं रहेगा। क्या स्वतंत्र भारत क्राउन के परमाधिकारों को उŸाराधिकार में पाने का दावा कर सकता है? इस प्रश्न के उŸार के लिए राज्यों में उŸाराधिकार से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय विधि के प्रावधानों को अवश्य ध्यान में रखना चाहए। ओपनहीम ने स्वीकारा है कि उŸारवर्ती राज्य पूर्ववर्ती राज्य के कुछेक अधिकार उŸाराधिकार में प्राप्त कर सकता है। हॉल की अंतर्राष्टीय विधि से यह पता चलेगा कि अन्य बातों में संधि द्वारा उŸाराधिकार राज्य होगा। परमोच्च शक्ति एक लाभ है जो उसे राजाओं के साथ की गई संधि से मिला है। इसलिए स्वतंत्र भारत परमोच्च शक्ति के उŸाराधिकार के लिए वैध दावा कर सकता है।
1 द् बाम्बे क्रोनिकल, दिनांक, 18 जून, 1948