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दी महारोंः वे कौन थे तथा वे कैसे अस्पृश्य बने?

इस लेख में, मैं तीन प्रश्न उठाना प्रस्तावित करता हूँ और उनका उत्तर देने का प्रयास करूँगा जो कि मेरी समझ के अनुसार अत्यधिक उपयुक्त उत्तर होंगे। ये प्रश्न हैंः (1) माहर कौन थे? (2) वे गाँव से बाहर क्यों रहते हैं? (3) उनको अस्पृश्य के रूप में वर्गीकृत क्यों किया गया? माहर कौन है?

श्री विल्सन ने माहर शब्द की उत्पत्ति महाराष्ट्र शब्द से की है और सुझाव दिया है कि महाराष्ट्र का अर्थ माहरों का देश है। महार शब्द की उत्पत्ति गुजरों के देश ‘गुजराष्ट्र’ और सोराज्य का देश ‘सौराष्ट्र’ के सादृश्य होने का समर्थन किया गया है। महार शब्द की इस उत्पत्ति पर आपत्ति दो विभिन्न आधारों पर की गई है, एक आपत्ति इस दृष्टिकोण पर आधारित है कि महाराष्ट्र शब्द का अर्थ महार देश से नहीं है परन्तु इसका अर्थ महान् देश है। दूसरी आपत्ति जो इसकी उत्पत्ति पर की गई है वह इस विचार पर आधारित है कि महार जो वर्तमान में अपनी सामाजिक हैसियत में इतने गिरे हुए हैं कि यह बिल्कुल भी नहीं माना जा सकता कि वे इतिहास में कभी भी देश के शासक की प्रतिष्ठित स्थिति में रहे हो। यह मेरा विचार है कि श्री विल्सन द्वारा प्रस्तुत की गई उत्पत्ति दो विभिन्न कारणों से समर्थन के योग्य नहीं है। विल्सन द्वारा प्रस्तावित उत्पत्ति को रद्द करने के लिए प्रथम कारण निम्न शब्दों में सूत्र बद्ध किया गया हैः यह स्पष्ट है कि यदि महाराष्ट्र माहरों का देश था, तो यह स्पष्ट है कि माहर शेष जनसंख्या से भिन्न एक सम्प्रदाय के रूप में प्राचीन काल से अस्तित्व में होते और इस नाम से इतिहास में जाने जाते। अब यहाँ यह दर्शाने के लिए कोई प्रमाण है कि माहर एक सम्प्रदाय के रूप में इतिहास में माहर के नाम से जाने जाते थे? यदि हम अपने आपको बम्बई प्रान्त तक ही सीमित रखें तो तीन प्रमुख सम्प्रदाय जो अस्पृश्य वर्गों से गठित हैः (1) दी महार (2) दी चांभर और (3) दी माँग। इनमें से महारों का सबसे बड़ा वर्ग है। यह विस्मयकारी बात है कि माँग एवं चांभर इतिहास में विद्यमान समुदायों के रूप में ज्ञात है परन्तु महार का समुदाय के रूप में कहीं कोई उल्लेख नहीं है। मनु ने कई वर्गों का उल्लेख किया